अध्यापक नहीं शिक्षक

अध्यापक नहीं शिक्षक

अंग्रेजी हटाओ आंदोलन के दिन थे। जैन उच्चतर माध्यमिक विद्यालय, दिल्ली की कक्षा सातवीं ‘सी’ को हिंदी पढ़ाने वाले अध्यापक तन, मन, धन से भागीदार बने हुए थे। प्राय: कक्षा में अध्यापन के लिए उपलब्ध नहीं रह पाते थे।

उस दिन भी यही हुआ था। एवजी अध्यापक के रूप में विज्ञान के अध्यापक को भेजा गया। वे नौवीं से ग्यारहवीं तक की कक्षाओं को पढ़ाते थे। सातवीं को हिंदी पढ़ाने में सर्वथा असमर्थ। सो कक्षा में आते ही उन्होंने घोषणा की, ‘‘इस पीरियड में सब शिक्षार्थी अपने-अपने मन का पढ़ सकते हैं। याद रहे, कक्षा में जरा भी शोर न हो!’’

खुली छूट मिलते ही छात्र अपनी रुचि के अनुरूप गतिविधियों में और वे स्वयं किसी किताब में खो गए। फिर भी कक्षा में मौन का वर्चस्व अधिक नहीं रह सका। जब शोर कक्षा-कक्ष की सीमाएँ लाँघकर बाहर पाँव पसारने को हुआ, तब अध्यपाक ने किताब से नजर हटाकर सबकी ओर निहारा। उन्हें देखकर हैरानी हुई कि जहाँ पूरी कक्षा मौन हो, डरी-डरी सी उनकी ओर निहार रही है, वहीं पिछली बेंच का छात्र किताब में खोया है!

संभवत: उन्हें दृश्य सुखकर लगा। उस छात्र की एकाग्रता और तल्लीनता ने उनका मन मोह लिया। उसे शाबाशी देने या फिर उसकी रुचि के विषय में जानने के लिए वे धीमी गति से उसके निकट पहुँचे। उनकी गतिविधि से अनभिज्ञ छात्र को सँभलने का अवसर नहीं मिला। जब तक कोर्स की किताब में रखी दूसरी किताब छिपाने का उपक्रम करता, दोनों किताबें अध्यापक महोदय के कब्जे में थीं। उन्होंने कक्षा को सुनाते हुए उसकी एकाग्रता का रहस्योद्घाटन किया, ‘‘तो यहाँ पिछली बेंच पर होने का लाभ उठाते हुए पाठ‍्य-पुस्तक के भीतर सड़क छाप जासूसी उपन्यास रखकर पढ़ा जा रहा है!’’ अध्यापक महोदय अपराधी छात्र को कक्षा से बाहर लाए। उससे उपन्यास के स्रोत के बारे में पूछा। कब से ऐसा चल रहा है! किसने यह आदत डाली! वह सब भी सच-सच बताने को कहा।

छात्र डरा हुआ तो था, पर उससे भी पहले वह ढीठ भी कम न था। उसने केवल स्रोत की जानकारी दी। बर्फ के गोले बेचनेवाले से एक दिन के लिए एक आने किराए पर लिया है। छात्र को आभास था, यह जानकारी तो देनी ही पड़ेगी। शेष दो जानकारियाँ न देने से भी काम चल जाएगा। बर्फवाले का यह कुछ न बिगाड़ पाएँगे, पर आदत डालने वाले की तो दुर्गति कर गुजरेंगे। सो वह नाम तो नितांत आवश्यक हो जाने पर ही उद्घाटित करना होगा। केवल एक जानकारी मिलने पर भी उन्होंने और जानकारियाँ पाने की जिद नहीं की। बल्कि छात्र को अपने पीछे आने को कहते हुए कक्षा से बाहर आकर बरामदे के एक क्षोर से दूसरे क्षोर तक चलते चले गए।

उन दिनों स्कूल में सभी को पाउडर का दूध पीने को दिया जाता था। पाउडर को घोलकर उबालने के लिए स्कूल प्रांगण में भट्ठी जलाई जाती थी। अध्यापक छात्र सहित उसी भट्ठी के पास आकर थमे और देखते ही देखते उस जासूसी उपन्यास को जलती हुई भट्ठी के हवाले कर दिया। यह दृश्य परिवर्तन होते ही छात्र का तो जैसे खून ही जम गया। अब वह बर्फवाले को उपन्यास की कीमत चार रुपए कहाँ से देगा! जब तक चार रुपए न जुटें, तब तक एक आना रोज के हिसाब से किराया कहाँ से चुकाएगा! उसके बड़े भाई तो निजी खर्चों के लिए मनीऑर्डर से हर महीने के शुरू में कुल पाँच रुपए भेजते हैं। यहाँ वह जैन बाल आश्रम का रहवासी है। आश्रमवासियों की अधिकांश आवश्यकताओं की पूर्ति आश्रम से ही की जाती है।

अध्यापक ने अधिक समय तक उसे इस भय से घिरा नहीं रहने दिया। वे उसे अपने साथ मुख्य बरामदे में लाए और लाइब्रेरी की दीवार की ओर मुँह करके खड़े रहने की सजा सुनाई। जाते-जाते यह भी कहते गए कि जब तक मैं न आऊँ, तुम्हें यहीं और इसी मुद्रा में खड़े रहना है!

छात्र की आँखों में एक ही दृश्य नाचने लगा। उपन्यास की कीमत और किराया न मिलने पर गोलेवाले ने इसे धर दबोचा है और जिस सूए से वह बर्फ फोड़ता है, वही सूआ इसकी अँतडि़यों के आर-पार करने जा रहा है! आधी छुट्टी हुई तो सभी सहपाठियों ने इसकी जमकर हँसी उड़ाई। पूरी छुट्टी होने पर इसी दृश्य को दूने उत्साह से दोहराया गया। दंड देनेवाले अध्यापक अवतरित हुए छुट्टी होने के पंद्रह मिनट बाद। इस बीच लज्जा के घूँट पर घूँट पी चुके छात्र ने राहत की साँस ली। स्वयं को समझाया, ‘हे मन! मुक्ति-क्षण आ पहुँचा है, सो धैर्य धारण कर।’

विज्ञान अध्यापक अपनी उस साइकिल पर सवार थे, जिसकी घंटी छोड़ सभी अवयव जानकारों को उसके आने का सस्वर संकेत देते जाते थे। छात्र के पास पहुँचते ही अध्यापक महोदय ने उसे नया आदेश दिया, ‘‘वहाँ से हटो और यहाँ आकर मेरी साइकिल के कैरियर पर बैठो!’’

मरता क्या न करता, अर्थात् छात्र के सामने कोई विकल्प था ही कहाँ! सो एक ही छलाँग के बाद वह कैरियर पर बैठा दिखाई दिया। उसके बैठते ही अध्यापक की साइकिल हवा से बातें करने लगी।

साइकिल पर बैठने के क्षण से गरदन को लगभग घुटनों तक झुकाकर बैठे उस छात्र ने जब गरदन ऊपर उठाई तो स्वयं को पुरानी दिल्ली स्टेशन के करीब पहुँचा हुआ पाया। वह एक क्षण को नई उलझन में घिर गया। इस अपराध के दंड स्वरूप मुझे घर की रेल में बैठाकर मानेंगे! इस संभावना के जनमने के पलभर बाद चेहरा खुशी से खिल भी गया। भय यह सोचकर निश्चिंतता में बदल गया कि अध्यापक महोदय को खबर ही नहीं कि इस स्टेशन से मेरे घर की दिशा में कोई रेल नहीं जाती।

छात्र की बेफिक्री से बेखबर अध्यापक ने साइकिल स्टेशन के ठीक सामने रोकी। पहले छात्र को उतरने को कहा, फिर खुद उतरे। साइकिल और छात्र को साथ-साथ लिये एक बाड़े में प्रवेश किया। वहाँ सैकड़ों साइकिलें पहले से खड़ी थीं। इन्होंने भी अपनी साइकिल वहीं स्टैंड पर लगाई। बेड़े से बाहर आए। आगे चलकर एक बड़े दरवाजे में दाखिल हुए। छात्र ने उनका अनुसरण किया। दरवाजे में दाखिल होने से पहले उस पर लिखी इबारत पढ़नी चाही। वहाँ बड़े आकार के अक्षरों में उस इमारत का नाम पढ़ने को मिला—‘दिल्ली पब्लिक लाइब्रेरी।’

अध्यापक महोदय ने छात्र को भीतर ले जाकर लाइब्रेरी के एक बड़े से कक्ष में खड़ा कर दिया। वहाँ कई खानों में हजारों किताबें करीने से रखी थीं। उन्हें देखकर छात्र की तबीयत नासाज हो गई। उसने मन ही मन सोचा, ‘काश, ये किताबें मुझे पढ़ने को मिल पातीं!’

तभी उन्होंने आदेश दिया, ‘‘तुम्हें इनमें से दो किताबें चुननी हैं। मैं बाहर रहूँगा। तुम किताबें लेकर वहीं आओगे!’’

यह सुनकर छात्र को यकायक अपने कानों पर यकीन ही नहीं हुआ। यह कैसे संभव है! ये तो मन को भी पढ़ने में समर्थ हैं! ये विज्ञानी हैं या अंतर्यामी! कैमिस्ट्री पढ़ाते हैं या पॉमिस्ट्री! भौतिकशास्त्र में निपुण हैं या ज्योतिष शास्त्र में! अध्यापक छात्र को उसी ऊहापोह में छोड़ कक्ष से बाहर जा चुके थे।

छात्र ने सब रैक छूकर देखे। फिर एक-एक किताब को उलट-पलटकर देखना शुरू किया। इस कक्ष में भारतीय भाषाओं से हिंदी में अनूदित साहित्य रहा होगा। छात्र को एक किताब के नाम ‘चौरंगी’ ने आकर्षित किया। पन्ना पलटने पर जानकारी मिली, शंकर का यह उपन्यास पंचतारा होटलों का यथार्थ उद्घाटित करता है और साहित्य अकादमी से पुरस्कृत है।

यह पढ़ते ही छात्र की तो बाँछें, जहाँ कहीं भी रही हों, खिल गईं! पंचतारा होटलों की असलियत! तब तो पढ़कर मजा आ जाएगा। थोड़ी मोटी है तो क्या हुआ! इसमें उसका क्या कुसूर! उसे तो अध्यापक यहाँ लाए हैं। उन्हीं ने किताबें चुनने को कहा है। छात्र कुछ और किताबों को उलटता-पलटता आगे बढ़ा। एक और किताब के नाम ‘रात का मेहमान’ ने आकर्षित किया। उपन्यासकार का नाम मनोज बसु। यह भी साहित्य अकादमी से पुरस्कृत बँगला उपन्यास। पन्ना पलटने पर जानकारी मिली, इसमें एक चोर की आपबीती है।

छात्र की बाँछें, वही जो जाने कहाँ थीं, वहीं की वहीं फिर खिल गईं! यह भी थोड़ा मोटा लगा, पर इससे क्या! अध्यापक महोदय ने कहा है कि दो किताबें चुननी हैं। वे मोटी होनी चाहिए या पतली, यह तो नहीं बताया। हो सकता है पतली किताबें चुनने पर वे मुझे कामचोर समझें! फिर से इसी कक्ष में भेजें और नए सिरे से किताबें चुनने को कहें। छात्र ने दोनों किताबें लाकर अध्यापक महोदय के सुपुर्द कर दीं।

उन्होंने सरसरी नजर डाली। फिर दोनों किताबें एक काउंटर के दूसरी ओर बैठे व्यक्ति को थमा दीं। उसने किताबों की जिल्द में बने खलीते से एक कार्ड निकालकर अपने पास रखकर किताबों के गत्ते पर चिपके एक कागज पर मुहर लगाई। अध्यापक से कार्ड लेकर किताबों से निकाले गए कार्डों के साथ नत्थी किए और दोनों किताबें वापस अध्यापक महोदय को सौंप दीं। अध्यापक ने किताबें छात्र को सौंपते हुए हिदायत दी, ‘‘तुम्हें अगले सात दिन में ये दोनों किताबें पढ़नी हैं। फिर मुझे इनका सार संक्षेप बताना है।’’

यह सुनकर छात्र को जो खुशी मिली, उसका वर्णन असंभव है। उसके लिए यह सूचना गूँगे के गुड़ समान थी। गूंगा गुड़ का स्वाद ले तो सकता है, उसे शब्दों में बयान नहीं कर सकता। यह छात्र भी उस क्षण खुश तो बहुत था, पर उस खुशी को चेहरे पर झलकने नहीं दे सकता था।

इतना अवश्य हुआ कि अध्यापक महोदय का आदेश सुनने के क्षण भर बाद ही उसका वह साहस और वह आत्मविश्वास वापस लौट आए जो चौथे पीरियड में उसे जासूसी उपन्यास पढ़ते हुए रँगे हाथों पकड़ लिये जाने के साथ ही उसका साथ छोड़ भागे थे। अब छात्र में यकायक बदलाव आया। उसे लगा, अब जब अध्यापक महोदय ने उससे उपन्यास पढ़वाना तय कर ही लिया है, तो क्यों न इन पर एक जिम्मेदार शिक्षार्थी होने का प्रभाव छोड़ा जाए!

छात्र ने दोनों किताबें उन्हें लौटाते हुए कहा, ‘‘यह तो नहीं हो सकेगा। मैं इन्हें पढ़ तो सकता हूँ, पर पढ़ नहीं पाऊँगा। मुझे स्कूल से मिला गृहकार्य भी करना होता है। शाम पौने छह से सवा नौ बजे तक समंतभद्र संस्कृत महाविद्यालय में पूर्वमध्यमा की कक्षा में अध्ययन भी करना होता है। फिर आश्रम में रात के दस बजते ही कमरे की लाइट बंद कर देनी होती है।’’

छात्र की लाचारी सुनकर अध्यापक महोदय से कुछ कहते नहीं बना। वे किताबों सहित लाइब्रेरी से बाहर आए। स्टैंड से साइकिल बाहर निकाली। उस पर सवार हुए और छात्र से कहा, ‘‘कैरियर पर बैठो!’’ साइकिल फिर हवा से बातें करने लगी। अब वे स्कूल की दिशा में आ रहे थे, पर उनका अंतिम पड़ाव स्कूल नहीं, आश्रम था। जहाँ पहुँचते ही उन्होंने सुपरिंटेंडेंट से कहा, ‘‘मैंने इसे दो किताबें पढ़ने को कहा है। इसलिए रात में जब तक यह पढ़ना चाहे, तब तक इसे लाइट जलाकर पढ़ने दीजिएगा।’’

अध्यापक महोदय छात्र को पढ़ने की आजादी दिलवाकर चले गए। अब छात्र के पास मनपसंद किताबें थीं, पढ़ने को पर्याप्त समय था। आधी रात तक वह किताबों को पलटता भी रहा, पर उन्हें पढ़ नहीं सका। उसे तो हर पन्ने पर एक ही घटनाक्रम लिखा महसूस होता रहा कि जैन स्कूल की कक्षा सातवीं ‘सी’ का एक छात्र बर्फ के गोले बेचनेवाले से किराए पर लिया उपन्यास न लौटा सका, न किराया चुका सका, न कीमत की भरपाई कर सका, सो बर्फवाले ने हाथ में सूआ लेकर उसे तलाशा। जैसे ही वह छात्र उसके हाथ लगा, उसने वह सूआ छात्र के पेट में घोंप दिया!

सुबह वही विज्ञान अध्यापक आश्रम में फिर हाजिर! वे छात्र को स्कूल प्रांगण में लाए। वहीं गोलेवाला बुलवाया गया। छात्र की मौजूदगी में उसे खबरदार किया, अब कभी किसी भी छात्र को ऊटपटाँग किताब दी तो फिर खैर नहीं! तुम्हें स्कूल के आसपास भी नहीं फटकने देंगे! रेहड़ी छीन लेंगे! पुलिस के हवाले कर देंगे सो अलग!

यह होना था कि छात्र ने अगली तीन रातों में ‘चौरंगी’ समाप्त किया। उससे अगली तीन रातों में ‘रात का मेहमान’ भी पूरा पढ़कर ही स्वयं से स्वयं को बिस्तर में ले जाने की सहमति और अनुमति ली। इन सातों दिन छात्र की केवल स्वयं से कहा-सुनी हुई। रे मूर्ख! साहित्य तो यह है! तू किस कचरे में मुँह मारता रहा! आठवीं सुबह छात्र ने दोनों किताबें अध्यापक महोदय को सौंप दीं। उन्हें पढ़ते हुए जो अनुभूति हुई, वह भी सारसंक्षेप के साथ बयान कर दी।

अध्यापक महोदय पर उसके कहे का खास असर नहीं हुआ। वे बोले, ‘‘ठीक है। अब इन्हें मैं भी पढ़कर देखूँगा।’’ ठीक पंद्रहवें दिन वह छात्र फिर उन्हीं शिक्षक की साइकिल के कैरियर पर बैठा दिखाई दिया। साइकिल एक बार फिर दिल्ली जंक्‍शन की दिशा में हवा से बातें करने निकली थी।

छात्र के असमंजस का कोई ठिकाना न था! उसे याद नहीं कि उसने किताबों में कुछ अपनी ओर से लिखा हो। किसी पात्र के बारे में या लेखक के बारे में या किसी अध्यापक के बारे में। वैसा कुछ, जैसा स्कूल लाइब्रेरी से कभी-कभार मिलनेवाली किताबों में लिखा होता है और इन दोनों किताबों में भी पहले से लिखा दिखाई दिया था। शिक्षक महोदय ने पिछली बार की तरह स्टैंड पर साइकिल लगाई। लाइब्रेरी के भीतर गए। दोनों किताबें जमा करवाईं। एक फार्म भरा। उस पर छात्र के हस्ताक्षर करवाए। फार्म काउंटर पर दिया। वहाँ से दो वैसे ही कार्ड लिये जैसे उनके पास पहले से थे।

दोनों नए कार्ड छात्र को थमाते हुए बताया, ‘‘इन दो कार्ड के बदले तुम इस लाइब्रेरी से कोई दो किताबें ले जा सकते हो। वे किताबें पढ़ने के बाद या न पढ़ पाए हो तो भी पंद्रह दिन में लौटानी होती हैं। इससे अधिक दिन में लौटाने पर पाँच पैसे प्रतिदिन विलंब शुल्क देना होता है।’’ अगले कुछ सालों में छात्र ने दिल्ली पब्लिक लाइब्रेरी मुख्यालय में मौजूद अखबारों की पुरानी कतरनें तक अपनी आँखों से स्कैन कर डालीं। इतना ही नहीं, किताबों में वर्ण्यविषय और हिंदी के पत्र-पत्रिकाओं के संस्थापक, संपादक, प्रकाशक, मुद्रक, पंजीकरण संख्या भी कंठस्थ कर चुका था।

आगामी जीवन में छात्र को और भी बहुत से अध्यापकों का शिक्षार्थी होने का अवसर मिला। कुछ का मेधावी, कुछ का कमजोर छात्र भी कहलाया, पर सही मायनों में उसे शिक्षित किया इकलौते उन एवजी शिक्षक ने जिन्होंने उसे कभी किसी एक भी पाठ‍्य-पुस्तक का एक भी हरफ न पढ़ाया, न रटाया! फिर भी वे उसमें अवर्णनीय, स्तुत्य संस्कार रोप गए। एक नहीं अनेक नेक नसीहतों की विरासत सौंप गए!

—कि साहित्य फुरसत में नहीं पढ़ना चाहिए, बल्कि साहित्य पढ़ने के लिए फुरसत निकालनी चाहिए।

—कि जिसमें संभावना देखो, तुरंत उसका साथ देना आरंभ कर दो। पर प्रतिदान की अपेक्षा से नहीं।

—कि जिसके हितचिंतक हो, उसकी कमजोरी को सार्वजनिक करके भी उसका हित साध सकते हो तो ऐसा करने में संकोच न करो।

—कि जब तक किसी के लिए जरूरी हो तभी तक उसके इर्द-गिर्द बने रहो, फिर अपना रास्ता बदल लो।

आज वह छात्र जीवन के बासठ बसंत पार कर चुकने के बाद यह कह पाने की स्थिति में है कि अन्य अध्यापकों का पढ़ाया-सिखाया उसके कितने काम आया, यह भले ही उसे याद न हो, पर उन एवजी शिक्षक का सिखाया पूरे जीवन उसके काम आया।

जीवन की तमाम उपलब्धियों के मूल में वही विज्ञान के शिक्षक रहे। उनके आचरण से मिला ज्ञान और शिक्षा रही। उन्होंने उसे सजा के तौर पर दिल्ली पब्लिक लाइब्रेरी के जिस रैक के सामने लाकर खड़ा किया था, उसी रैक में आज वह अपनी रचना की शक्ल में साधिकार सजा हुआ है।

आज बहुत से लोग उस छात्र को वीरेंद्र जैन उर्फ वीरेंद्र सिरसौद उर्फ वीरेंद्र ७२९ नाम से जानते हैं। वह छात्र उनकी स्मृति को नमन करता है। फिर भी उनके ऋण से उऋण नहीं होना चाहता। उन्होंने वह कदम उसे अपना ऋणी बनाने के लिए नहीं ही उठाया था। शिक्षक का गुण और स्वभाव माना जाता है अक्षरों से ही नहीं, आचरण से भी औरों को संस्कारवान बनाना। कच्ची मिट्टी से शिक्षार्थियों को समाजोपयोगी स्थायी स्वरूप देना, उनका परिष्कार करना।

ऐसे तमाम गुरुजनों को, विद्वज्जनों को हृदय की गहराइयों से साधुवाद। वे हमारे आदर के पात्र हैं। हम उन्हीं की अपेक्षाओं के प्रतिफल हैं।

दूरभाष : ९८६८११३९७६

सी-3/55, सादतपुर कॉलोनी,

करावल नगर रोड, दिल्ली-110090
वीरेंद्र जैन

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