पिंटू

पिंटू

फाटक खुलने की आवाज के साथ ही एक किशोर लड़के की आवाज सुनाई दी—“पेपर वाला!” मैं फौरन पेपर लेने के लिए फाटक पर जाती हूँ। सामने पिंटू को देखकर बरबत अपनी आँखों पर मुझे विश्वास नहीं होता, क्योंकि पिंटू आज हॉकर के रूप में मेरे सामने खड़ा हुआ था। फिर भी यह हकीकत थी कि अखबार वाला पिंटू ही था और कोई नहीं। बरबस उसे देखते ही मेरे मुँह से निकल पड़ता है—“अरे पिंटू तुम?”

वह खिलखिलाकर हँसते हुए बोलता है—“कहो दीदी, कैसी रही, दे दिया न सरप्राइज?”

“सचमुच पिंटू मुझे तो अब भी विश्वास नहीं हो रहा है। अरे भई, तुमको यह क्या सूझी? अच्छे खाते-पीते, भले घर के लड़के हो, तुम्हारे घर में हर तरह की सुविधाएँ हैं, फिर तुमने ऐसा काम हाथ में लिया, क्यो? क्या तुम बता सकते हो?”

“दीदी, आज मैंने तुम्हें ही नहीं बल्कि अपने मम्मी-पापा, टीचर और अपने सभी दोस्तों को सरप्राइज दे चुका हूँ। और सभी ने मेरे इस काम को देखकर आश्चर्य व्यक्त किया है।”

“भाई, मुझे तो अब भी तुम्हारे इस काम में किसी उद्देश्य की झलक दिखाई दे रही है! यद्यपि मैं विश्वासपूर्वक नहीं जानती कि इस काम को करने में भला तुम्हारा क्या उद्देश्य हो सकता है? या कहीं मैं सपना तो नहीं देख रही हूँ?”

“दीदी, आप सपने की दुनिया से वास्तविकता की दुनिया की ओर आ जाओ और आज से मुझे हॉकर के रूप में ही जानो”।

“पिंटू! चलो तुम्हारे कहने से मैं वास्तविकता की ओर आ जाती हूँ। लेकिन तुम्हें इस वास्तविकता का राज मुझे कहना होगा”।

“मैं जानता था कि तुम मुझे अवश्य पूछोगी, इसलिए मैं सभी पेपर बाँटकर आखिर में आपके यहाँ आया। जब आपने पूछ ही लिया तो सुनिए—“सबसे पहली बात तो यह ‌कि मैं यह अनुभव प्राप्त करना चाहता था कि किस तरह वे गरीब लड़के पढ़ते हुए अखबार बेचने का काम करते हैं और अपने माता-पिता की समय-समय पर आर्थिक मदद करते हैं।”

मैं पूछ बैठती हूँ—“वे तो गरीब हैं, इसलिए यदि उनके लड़के ऐसा काम करते हैं तो यह उनकी आवश्यकता है, किंतु तुम तो बड़े बाप के लड़के हो। तुम्हारे इस काम से लोग हँसेंगे नहीं?” अरे दीदी, इसमें हँसने की क्या बात है? मैं चोरी थोड़े ही कर रहा हूँ, जिससे पिताजी की इज्जत में आँच आ जाए। मैंने पहले से ही अपने डैडी को राजी कर लिया था।”

“तो क्या यह केवल आज-आज के लिए ही है?”

“नहीं दीदी, मेरी तो यह योजना है कि मैं इस काम को नियमित रूप से करूँ। यदि बीच में कोई किसी तरह का अड़ंगा न लगे तो।”

कुछ क्षण के लिए मैं सोचने लगती हूँ, पिंटू खाते-पीते घर का लड़का। बँगला, नौकर-चाकर, टेलीफोन, कार और न जाने क्या-क्या? पिंटू पब्लिक स्कूल में सेकेंडरी में पढ़ रहा है और रोजाना कार से वह स्कूल आता-जाता है। फिर पेपर बेचने का काम तो यदि आज भर के लिए हो तो कोई बात नहीं थी। किंतु वह तो इस काम को प्रतिदिन करने पर आमादा है। क्या ऐशो-आराम में पले-बढ़े किशोर के लिए यह संभव होगा? मुझे कुछ देर सोचते हुए देखकर पिंटू पूछ बैठता है—“क्यों दीदी, तुम क्या सोचने लगीं?”

“कुछ नहीं रे! तू तो यह बता कि इस काम को करने के लिए तेरा प्रेरणास्रोत कौन है?”

“दीदी, मेरा एक दोस्त राजेश है, जो मेरे साथ पढ़ता था! किंतु गरीबी की वजह से वह पब्लिक स्कूल में आगे नहीं पढ़ पाया। मजबूर होकर उसने किसी सरकारी स्कूल में एडमीशन लिया। जिस दिन उसने स्कूल छोड़ा, उसकी आँखों में स्कूल छोड़ने का दुःख साफ दिखाई दे रहा था। हम दोनों में पक्की दोस्ती थी, इसलिए मुझे भी उसके स्कूल छोड़ने का दुःख हुआ। पता नहीं क्यों, वह बड़ा ही स्वाभिमानी निकला। उसने मेरे इस प्रस्ताव को कि मैं उसके लिए स्कूल की फीस का बंदोबस्त कर दूँगा, उसने बड़ी शालीनता से अस्वीकार कर दिया। वही इन दिनों एक पेपर एजेंसी की दुकान से पेपर लेकर घर-घर बेचता है और उसे करीब पाँच सौ से लगाकर छह सो रुपया महीने की आय हो जाती है। इस प्रकार वह न केवल अपना घर खर्च चलाने में अपने माँ-बाप की मदद करता है, बल्कि अपने छोटे भाई-बहन और खुद की पढ़ाई का खर्च भी पूरी तरह से चला लेता है। तभी से मेरे मन में यह जिज्ञासा पैदा हुई। मैं भी अपने आप को इस काबिल बनाऊँ कि मैं हॉकर के रूप में पार्ट टाइम काम करके गरीब विद्यार्थियों की जिस तरह से भी हो सके, कॉपी-किताबें, फीस इत्यादि के लिए अपनी कमाई को सहायता के रूप में खर्च करूँ।”

मैं पूछ बैठती हूँ—“तो इसके लिए तुम्हें हॉकर का काम करने की भला क्या आवश्यकता है? तुम्हारे डैडी के पास तो काफी पैसा है। उन्हीं के कहकर इस शहर के सभी स्कूलों में कुछ फंड वार्षिक रूप से जमा करवा दें, ताकि ऐसे जरूरतमंद लड़कों की आवश्यकतानुसार आर्थिक सहायता की जा सके। तुम चाहो तो अपने डैडी से कहकर बड़े-बड़े लोगों से डोनेशन भी इकट्ठा कर सकते हो।”

“दीदी, ऐसे काम के लिए अगर मैं अपने डैडी से मदद लूँगा तो फिर आप ही सोचिए, मेरा क्या योगदान रहा? मैं तो यही चाहता हूँ कि मैं कुछ-कुछ परिश्रम करके जो भी आमदनी हो, उसे अपने ही स्कूल के उन गरीब विद्यार्थियों के लिए खर्च करूँ, जिनको आर्थिक सहायता की आवश्यकता है।”

“इसका मतलब तो यह हुआ कि तुम इस शुभ काम को अपने ही स्कूल में शुरू करना चाहते हो? लेकिन पिंटू, तुम्हारा स्कूल तो पब्लिक स्कूल है, जहाँ उन्हीं लोगों के लड़के पढ़ते हैं, जिनकी आर्थिक स्थिति मजबूत होती है।”

“दीदी, आपका कहना बहुत कुछ सही है। किंतु मेरा यह व्यावहारिक अनुभव है कि गरीब लोग भी अपने लड़कों को पब्लिक स्कूल में इसलिए भरती करते हैं कि उनके लड़कों का स्तर ऊँचा हो और भविष्य भी
उज्‍ज्‍वल बने। इसके लिए वे तकलीफें भी सहन करते हैं। उदाहरण के रूप में राजेश नाम लूँगा। ऐसे माँ-बाप के लिए लड़कों की पढ़ाई एक तरह से सिरदर्द रहती है। वे हमेशा यही सोचते रहते हैं कि कहीं ऐसा न हो कि समय पर फीस जमा न होने पर उनका लड़का मानसिक रूप से प्रताड़ित हो। ऐसे ही लड़कों को समय-समय पर कुछ-न-कुछ आर्थिक सहायता की आवश्यकता होती है। मैं अपनी कमाई से उन्हीं लड़कों की ममद करना चाहता हूँ। क्योंकि मैंने पढ़ा था—‘किसी भी अच्छे काम की शुरुआत अपने ही घर से करना चाहिए।’ यही सोचकर मैंने संकल्प कर लिया है कि मैं ही स्कूल से क्यों न शुरू करूँ।”

“विश यू बेस्ट ऑफ लक।”

“थैंकयू दीदी। अच्छा दीदी, अब मैं चलता हूँ। मुझे तैयार होकर स्कूल जाना है।”

“अरे भाई, तुमने एक अच्छे काम की शुरुआत की है, इसलिए कम से कम इस खुशी में मिठाई तो खाते जाओ।” कहकर मैं प्लेट में बर्फी ले आती हूँ।

बर्फी के एक टुकड़े को अपने मुँह में रखकर पिंटू ने साइकिल के पैडल पर पाँव रखा और अपने घर की ओर बढ़ गया। मैं पिंटू के इस सेवा-भावी कदम की मन ही मन प्रशंसा करते हुए उसको तब तक जाते हुए देखती रही, जब तक कि वह मेरी आँखों से ओझल नहीं हो गया।

 

म.न. १, म. ९,

गायत्री नगर, हिरनमगरी, सेक्टर-5,

उदयपुर-313002 (राजस्‍थान)

दूरभाष : 09461403169
—विष्णु भट्ट

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