'सब चलता है' का राष्ट्रीय जीवन-दर्शन

'सब चलता है' का राष्ट्रीय जीवन-दर्शन

कहते हैं कि हर देश का अपना जीवन-दर्शन है। पश्चिम के अधिसंख्य लोग भौतिकतावादी हैं, जबकि भारत में जोर आध्यात्मिकता का है। चोर, डाकू, कालाबाजारिए, अभावग्रस्त, बेकार, समृद्ध, निर्धन, ठग, हत्यारे आदि हफ्ते में एक दिन या रोज मंदिर जाकर अपने कर्मों या दुष्कर्मों के भार से मुक्त हो जाते हैं। ऐसा नहीं है कि गरीब की यह भक्ति पैसे की चाह के कारण है और समृद्ध की कमाई बढ़ाने को। सबकी अपनी-अपनी महत्त्वाकांक्षा हैं। चोर-डाकू का अरमान ऐसा घर लूटने का है, जिससे बैंक की दौलत का सुख हो। नकदी, जेवर, हीरे, जवाहरात की इफरात हो। वह सोचता है कि एकबार ऐसा लंबा हाथ मारने का प्रभु मौका दे तो वह इस नापाक धंधे से ‘रिटायर’ होकर नेकी की जिंदगी बसर करे।

दीगर है कि न नौ मन तेल होता है, न राधा के नाचने की संभावना। मनोचिकित्सकों की मान्यता है कि हर जरायम पेशा के अंतर में एक शरीफ इनसान का वास है। यह जो कंबख्त पेट है और उसे भरने के अवसरों की कमी या अभाव, यही उसे अपराधी बनाते हैं। कौन कहे कि सच क्या है? कुछ यह भी मानते हैं कि अधिकतर बस्तियाँ जंगल काटकर बसी हैं। उनकी धारणा है कि नष्ट कुछ भी नहीं होता है। कतई मोबाइल की उस कॉल सा, जो ‘डिलीट’ होने के बाद भी उपलब्ध है। यही जंगल अब इनसानों के मन में आ बसे हैं। सभ्यता के झीने आवरण को तोड़ यह उसे कभी पाशविक बनाते हैं, कभी हिंसक। इनसानी अंतर के इस जानवर के रूप अनेक हैं। कहीं यह बलात्कार के रूप में प्रकट होता है, कभी दूसरों का हक मारने के लिए, कभी स्वार्थ सिद्ध के लिए झूठी प्रशंसा-निंदा में, कभी पैसा कमाने के लिए आवश्यक वस्तुओं की नियंत्रित आपूर्ति में। ऐसे विरोधाभासी ज्ञान से हमें कभी-कभी शक होता है कि कोई शत-प्रतिशत शरीफ है या कि नहीं? कहीं ऐसा तो नहीं है कि हम ‘जिन्हें नेकी का आदर्श नमूना समझते हैं, वह असलियत में कुत्सित आचरण के गुनहगार सिद्ध हों? क्या जो दिखता है, वह सच नहीं है और जो नजर नहीं आता है, वही सच है? इन्हीं शंकाओं से घिरकर हमें देश की आध्यात्मिकता या धार्मिक आस्था तक पर संदेह होने लगता है। क्या जनसेवा समाज का हित चिंतन अथवा जन-कल्याण केवल अर्थहीन घिसे-पिटे शब्द हैं? इनका उपयोग सिर्फ शब्दकोश में है, जीवन में नहीं?

हमें यह भी विश्वास है कि ऐसा जरूर कभी रहा होगा। सफलता और जन-कल्याण की छवि अर्जित करनेवाली पहली पीढ़ी ने जरूर जन-सेवा की होगी अन्यथा यह शब्द चलन में कैसे आते? यह तो बाद में हुआ होगा कि श्रम-परिश्रम से कन्नी कटाकर उनके वंशज या समर्थक शब्द दोहराकर यह समझते रहे कि उन्होंने अपना दायित्व निभा लिया है। सेवा कहा और सेवा हो गई। इस तरह के जुबानी जन-सेवकों की भरमार है आजकल। ऐसों के कारण ही इसीलिए, नेता का नाम सुनते ही कुछ को थूकने की याद आती है, कुछ को गालियों के अपने खजाने के प्रदर्शन की। उनकी ख्याति है कि उन्होंने शोध और अध्ययन कर नई-नई गालियों की ईजाद की हैं। वह तो गनीमत है कि उन्होंने अब तक हिंदी विभाग में शोध-पत्र प्रस्तुत नहीं किया है, वरना कब के वह अपने नाम के आगे ‘डॉक्टर’ लगाने के अधिकारी हो जाते। वह कहते भी हैं कि उनकी सारी मेहनत स्वान्तः सुखाय है। इसमें कोई स्वार्थ न होकर केवल मन का संतोष है।

ऐसे ही आध्यात्मिक संतोष के लिए कुछ धन-मशीनों ने अपने आवास में ही मंदिर भी बना लिए हैं। ऐसा नहीं है कि उस में खाली-पीली राम, हनुमान, कृष्ण आदि की मूर्तियाँ स्थापित की गई हैं। आते-जाते घर के सदस्यों या आगंतुकों ने इनके दर्शन कर अपनी श्रद्धा प्रकट कर दी। यहाँ फुल-टाइम पुजारी भी है। रात-दिन यहाँ कोई-न-कोई भजन-कीर्तन, प्रभु का स्नान, प्रसाद, भोजन आदि चलता ही रहता है। जाहिर है कि यह धन-मशीन के घर की दिनचर्या के अनुरूप हो। भगवान् हों या इनसान, कहीं-न-कहीं, कुछ समझौता तो करना ही पड़ता है। ऐसा ही समझौता धन-मशीन ने अपनी आस्था के साथ किया है। आस्था की आवाज के अनुसार, उन्हें रोजाना मंदिर जाना पड़ता। एक-दो घंटे बरबाद होते। इतने समय में तो वह हजारों कमा या गँवा देते हैं। उनकी एक नजर सट्टा- बाजार पर होती है, दूसरी अपने कारखाने पर। उनकी निजी वित्तीय सेवा में कई विशेषज्ञ हैं। वह उन्हें शेयर मार्केट से लेकर कारखानों के उत्पादन तक पर ‘ब्रीफ’ करते हैं। पर उन्होंने हमेशा निर्णय अपनी अंदर की आवाज के आधार पर किए हैं। कभी उससे बेशुमार मुनाफा होता है, तो कभी अनपेक्षित नुकसान भी। वह विवश हैं, क्या करें? अब यह उनके व्यक्तित्व का अंग है। घर के मंदिर ने उनकी भक्ति और श्रद्धा की छवि में चार-चाँद लगाए हैं। जो सुनता है, कहता है कि फलाने सेठजी गजब के धार्मिक हैं। रात-दिन भक्ति में लीन रहते हैं।’’ धर्म के सन्मुख उनके धन की चर्चा कम होती है। ऐसा नहीं है कि चोर, डाकू इससे न प्रभावित हों? उनका लूट-पाट का अपना धर्म है। वह उसे भरसक निभाते हैं। धन-मशीन के घर पर उनकी नजर है। किंतु जो उन्हें अपने कर्म से रोकता है, वह उनके सशक्त ‘गार्ड’ हैं। सबकी अपनी-अपनी जुबान है। उसी की भाषा उनके पल्ले पड़ती है। यह व्यक्तियों का ही नहीं, देशों का भी सच है। तभी तो चीन पंचशील दोहराते-दोहराते भारत की जमीन भी हथियाता रहा। वहीं दोस्ती की आड़ और नेक इरादों के बीच आज भी वैसी ही हरकत के लिए प्रस्तुत है। जैसे धोखा और विस्तारवाद उसके राष्ट्रीय चरित्र का अंग है। पडोसी से उसकी दोस्ती की इकलौती शर्त अपनी सीमा की जमीन गँवाना है। जिसका ऐसा ‘हड़पिया’ व्यवहार सहने का माद्दा है, वही उसका दोस्त है जैसे नेपाल या पाकिस्तान। उम्मीद है कि ‘आँख के अंधे, नाम नैन सुख’ जैसे यह देश भी चीन की असलियत से जल्दी ही परिचित होंगे। फिलहाल तो दोनों की आँखों पर सहायता की सहूलियत की पट्टी चढ़ी है।

ऐसा नहीं है कि घर के मंदिर की धन-मशीन कभी बाहर के पूजाघर नहीं जाती है। जब उसे अपनी दौलत और खुद के प्रचार हुड़क उठती है तो वह किसी न किसी मंदिर में दर्शनार्थ पधारते हैं। पेशेवर कैमरामैन उनके प्रचार मैनेजर के साथ हैं तथा टी.वी. अखबार के संबंद्ध संवाददाता। समय के अनुसर इनके लंच या डिनर का प्रबंध किसी फाइव-स्टार होटल में होता है और वहीं भेंट-गिफ्ट का भी। शहर के धार्मिक कलेंडर में यह दान की वारदात एक मील का पत्थर है। इसे देखकर शहर की दूसरी धन-मशीनें भी धर्म-मशीन के इस प्रकार के सार्वजनिक प्रचार के लिए प्रेरित होती है। चाँदी मंदिरों की कटती है, जेब जनता की। कौन ऐसे प्रचार की राशि अपनी जेब से देता है? सब जनता के बीच ‘गुडविल’ कमाने का तरीका है। बड़े औद्योगिक घरानों का मंदिर-मस्जिद-चर्च से जुड़ना कोई आश्चर्य का विषय नहीं है, सबका अपना इकलौता उद्देश्य निजी उल्लू सीधा करना है, छवि बनाने का। इसमें धंधे का स्वार्थ धार्मिक आस्था के काफी पहले है। कोई खोजे तो जाने कि पैसा कमाना ही उनका वास्तविक मजहब है। बाकी तो दिखावा है।

इस मिश्रित स्वार्थ प्रेरित माहौल में किसी एक वर्ग को दोष देना कहा तक उचित है? हमारे प्रतिष्ठित साधु-संत, कुछ अपवाद छोड़कर ऐसी ही लूट में लगे हैं। कुछ ने अपना उद्योग चला रखा है। कहने-कहने को वह योगगुरु हैं, पर वह हर बहूद्देशीय प्रोडक्ट के निर्माता को टक्कर देने में समर्थ हैं। बहूद‍्देशीय कंपनी के सीमित उपभोक्ता पदार्थ होंगे, पर योग गुरु तो चाय से लेकर चूरन तक के एक्सपर्ट हैं। अब तो इनकी चाँदी है। आत्म-निर्भर भारत में, क्या पता, यह पूरा तोपखाना न बनाने लगें? इधर एक और खासियत नजर आती है। साधु-संत जो कहने को प्रभु की भक्ति और परलोक सुधारने में खोए हैं, वह इस लोक की सियासत में भी सक्रिय होने लगे हैं। यह हमारे धर्म-प्रधान देश का एक नूतन और अनूठा आयाम है।

देश में कुछ ऐसे हैं, जिनका जीवन केवल पेट-प्रेरित है। उनका आदर्श, जीवन, दर्शन, चिंतन, सोच आदि सब पेट भरने तक सीमित है। कहा भी जाता है, जो सोलह आना सच है कि ‘भूखे भजन न होय गुपाला।’ भरे पेट व्यक्तियों को ही देश-दुनिया की चिंताएँ सताती हैं। इनमें भी अधिकांश ऐसे हैं, जो सत्ता की साधना में लीन हैं और उसे हथियाने की जुगत में भिड़े हैं। ये राज-नेता कहलाते हैं। इनकी मान्यता है कि वह जन-सेवक हैं। हालाँकि जनता के अनुसार इनका यकीन केवल खुद की सेवा में है। इनका दावा है कि यही इनका पारिवारिक पेशा है। कभी बुजुर्गों ने जन-सेवा या देश-सेवा ऐसी गलती की होगी, उसके बाद से किसी ने भूले-भटके इन शब्दों को सिर्फ भाषण-आश्वासन या इंटरव्यू के दौरान दोहराया है। इस मौखिक ताल्लुक का वास्तविक आचरण से दूर-दूर का संबंध नहीं है। उन्होंने सियासत में जो भी सेवा की है, वह अपनी और अपने परिवार की है। जो भी रियायत दी है, वह अपने जात-भाइयों को दी है। तभी वह जमीन से जुड़े हैं। आजादी के बाद से जाति से जुड़ाव ही जमीन से जुड़ाव है। इधर ऐसे ही नेता फल-फूल रहे हैं।

नेता बिरादरी के बाद बारी मध्यम वह निम्न मध्यम वर्ग की है। इनके लिए मंदिर, मस्जिद, चर्च, गुरुद्वारा आदि जाना ही अपने भक्ति-भाव का सार्वजनिक प्रदर्शन है। इतना काफी है। बस यह कर्तव्य निभा लिया तो उसके बाद की ऊपर वाले की सीख पर अमल करने की क्या जरूरत है? सबने देख लिया कि व्यक्ति बेहद आस्थावान है। फिर आतंक, हिंसा, पर निंदा, स्वार्थ पूर्ति, लूट-पाट, हत्या सब करो, रोकता कौन है? आध्यात्मिकता का ढोंग अधिकतर तथाकथित बुद्धिजीवी करते हैं। उन्हें औपचारिक पूजा-पाठ में यकीन नहीं है। इसमें मस्जिद की नमाज, चर्च की सीख अथवा गुरुद्वारे की गुरुवाणी भी शरीक है। इनका एकमात्र लक्ष्य निजी प्रचार है। महत्त्वपूर्ण व प्रसिद्ध होने की स्वार्थ पूर्ति है। उसके लिए वह हर किस्म का पापड़ बेलने को कटिबद्ध हैं। चीन द्वारा सीमारेखा के उल्लंघन से इन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता है, सिवाय इसके कि इस विषय में कविता, लेख, सेमिनार में वक्‍तव्य, बहस आदि की सामग्री तैयार है। अब उन्हें प्रतीक्षा है कि कहीं उसका उपयोग करें। कुछ पैसे-टके का प्रबंध हो, बोलते या बैठे हुए फोटू छपे।

ऐसे जब भी सीमा-पार की किसी भी चीनी हरकत का समाचार सुनते-पढ़ते हैं, तो खिड़की से अपने घर की बाउंड्री की ओर नजर जरूर डालते हैं। यदि वह सेफ है तो वह आश्वस्त हैं कि उनके जीवन में काई समस्या नहीं है। दूसरे का घर गिरे या वहाँ डकैती पड़े, आतंकवादी उपद्रव करें या देश की सीमा-रेखा को खतरा हो, अपना घर और परिवार सलामत है तो सब ठीक है। बाकी तो चलता है। सीमा के लिए सेना है, उसके अस्त्र-शस्त्र की आपूर्ति के लिए सरकार है। उसके खर्चें में हमारा भी तो योगदान है। पहले चोरी संभव थी, अब तो पूरा आयकर समर्पित है, सरकारी जेबकतरों को। पडोसी का क्या? वह कौन अपना है? सिवाय अपना कूड़ा हमारे लॉन में फेंकने के और करता ही क्या है? कभी चाय के लिए दूध माँगने को उसकी पत्नी ‘बहन जी’ की हाँक लगाती पधार जाती हैं, कभी सुबह बाहर से अखबार उठाने वह खुद। ऐसा अकसर छुट्टी के दिन होता है, जब दफ्तर का अखबार उपलब्ध नहीं है। इसलिए उनका निष्कर्ष है कि सरकारी कर्मचारी होते ही मुफ्तखोर हैं। वेतन तो सीधे बैंक खाते में जाना ही जाना है, ऊपर की कमाई यानी घूस तक जेब के लॉकर से ऐसे निकलती है, जैसे गरमी के दिनों में सरकारी नल से पानी। बस टपकने या कराहने की, हाँ-हूँ जैसी आवाजें आती हैं और पानी नदारद।

‘यह चलता है’ का दृष्टिकोण सामान्य नागरिक का ही नहीं, देश के बुद्धिजीवी का भी है। उसकी तो एक और दिक्कत है, उसके साथ वैचारिक नजरिए का भी संकट है। यदि उनकी विचारधारा साम्यवादी है तो वे हर मसले को चीन-रूस के चश्मे से देखते हैं। उन्होंने चीन का वैचारिक नमक खाया है, उसका विरोध कैसे करें? कुछ पूँजीवाद के पिछलग्गू हैं, उन्हें जीते जी अमेरिका के स्वर्ग की हसरत है। इन मानसिक ग्रंन्थियों के सरकार को भी पटा के रखना है अन्यथा कमेटी, संस्थानों के पद, सम्मान आदि कैसे हासिल होंगे? इसके साथ जब ‘सब चलता है’ का नजरिया जुड़ता है तो ऐसा चूँ-चूँ का मुरब्बा तैयार होता है, जो अपने आप में अप्रतिम है। इनके लेखन में भी यही विरोधाभास झलकता है। सामान्य इनसान के लिए ‘सब चलता है’ एक ऐसा दृष्टिकोण है, जो उसकी विवशता है। उसकी इतनी व्यक्तिगत समस्याएँ हैं कि वह उनसे जूझे या राष्ट्रीय प्रश्नों से? लिहाजा वह सबसे मुखर व्यक्ति से सहमत है, बिना किसी अपने योगदान के। उसका जीवन ‘सब चलता है’ के नजरिए से प्रभावित है। संक्षेप में क्या यही हमारा राष्ट्रीय जीवन-दर्शन है?

९/५, राणा प्रताप मार्ग, लखनऊ-२२६००१

दूरभाष : ९४१५३४८४३८
—गोपाल चतुर्वेदी

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