सहारा-बोझ

सुनील जब से घर में काम करने आया, मनोरमा को आराम-ही-आराम था। घर के सारे काम आज्ञाकारी व सरल स्वभावी सनील पूरे उत्साह व मनोयोग से करता।

“मैडमजी सुनील को 4-6 दिन के लिए गाँव ले जाना चाहता हूँ, इसकी माँ इसके बिना बहुत उदास है। शीघ्र ही वापस भेज दूँगा।” गाँव से आए सुनील के गरीब पिता सनातन ने निवेदन किया।

“अब सुनील हमारा बेटा है। आप इसकी माँ को कह दें कि इसकी कोई चिंता न करें। मैं हूँ न।” मनोरमा ने मुसकराते हुए कहा।

अंततः सनातन को खाली हाथ वापस गाँव जाना पड़ा।

सीढ़ियों से पैर फिसल जाने के कारण सुनील के पैर में फ्रेक्चर हो, प्लास्टर बँध गया व मनोरमा का सबल सहारा सुनील अब उसके लिए बोझ-सा बन गया। उसने सुनील के पिता को तुरंत बुलवा लिया।

“आप कह रहे थे न, कि इसकी माँ इसके बिना बहुत उदास रहती है, इसीलिए कुछ दिन के लिए घर ले जाइए। माँ खुश हो जाएगी, सुनील भी सभी से मिल लेगा, मन बहल जाएगा इसका। छह माह से सबसे नहीं मिला।” कहकर मनोरमा ने सुनील को उसमें गाँव भेज दिया।

 

वीनस-१६, मीनाक्षी प्लेनेट सिटी,

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—अरुण कुमार जैन

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