धर्मपत्नी

धर्मपत्नी

धड़कते दिल से लोक सेवा आयोग की वेबसाइट खोली नीरजा ने। यू.पी.पी.सी.एस. का परिणाम सामने था। लिस्ट देखना शुरू किया, जैसे-जैसे परिणाम की लिस्ट आँखों से गुजरती गई, नीरजा का दिल डूबता गया, मन में उधेड़-बुन चलती रही, लगता है इस बार भी कहीं नाम नहीं आया, आखिरी चांस था, आगे क्या होगा? वह सोच नहीं पा रही थी। मन में आया, लिस्ट का सत्तर प्रतिशत हिस्सा वह देख चुकी है, आगे देखने का कोई फायदा नहीं है, अपना परिणाम देखना होता तो शायद यही करती परंतु यह तो उसके पति अशोक का परिणाम था, दिल थामकर देखती रही कि अचानक लिस्ट समाप्त होने से पहले निगाह ठिठककर ठहर गई। अशोक कुमार नाम के साथ जो रोल नंबर था, उसे धड़कते दिल से पढ़ा, फिर दोहराया, रोल नंबर उसे जुबानी याद था, संदेह की कोई गुंजाइश नहीं थी, आँख भरकर नाम के साथ रोल नंबर देखा और दिल थामकर बैठ गई। मन के भीतर से कोई बोल उठा, शायद सपने इसी तरह सच होते हैं। आकाश कुसुम भी इसी तरह से हाथ में आ जाता है। हाथ में थमा मोबाइल बजा तो जैसे किसी तंद्रा से जागी वह, फोन अशोक का था, उठाने के साथ हलो बोलने से पहले अशोक की आवाज आई, “रिजल्ट आ गया नीरू।”

“देखा मैंने।” भरे गले से बोली नीरजा।

“पी.सी.एस. प्रापर नहीं, एलाइड सर्विस मिली, शायद नायब तहसीलदारी से शुरुआत हो।”

“ईश्वर की असीम कृपा हुई है हम पर।”

“अरे, तुम्हें दुःख नहीं हुआ, तुम्हारे पति को पी.सी.एस. प्रापर या पी.पी.एस. नहीं मिला?”

दो बातें कर लेने के बाद संभल गई थी नीरजा, अपने खास लहजे में बोल उठी, ‘मेरे पति का नाम ही अशोक है, मतलब शोक और दुःख उसके पास नहीं फटक सकता।’

“तुम्हारे इसी पॉजीटिव एप्रोच का फल है यह नीरू, वरना मैं तो निराश हो गया था।“

“बस-बस यह वक्त निराशा को याद करने का नहीं है, घर पहुँचो, मैं भी काम खत्‍म करके निकलती हूँ।”

वैसे अशोक ने बात सही कही थी, नीरजा की सकारात्मक सोच उसके मन को गिरने से हर बार बचा लेती। अपने शहर से हाईस्कूल पास करने के बाद वह दिल्ली चला गया पढ़ने। दिल्ली विश्वविद्यालय से एम.ए. करने के बाद देश के विभिन्न प्रदेशों से आए हुए लाखों अन्य लड़के-लड़कियों की तरह प्रतियोगी परीक्षा की तैयारियों में डूब गया। अथक परिश्रम करने के बावजूद साल दर साल गुजरते गए, कोई परीक्षा पास नहीं कर पाया। देश के हर प्रदेश से आए हुए लाखों छात्र-छात्राओं की तरह दिल्ली की भीड़ का हिस्सा बनने के बाद वह धीरे-धीरे भीड़ में गुम होने लगा। नीरजा से उसकी मित्रता कोचिंग सेंटर में हुई। कोचिंग करने के साथ-साथ नीरजा ने एम.ए. करने के बाद बी.एड. कर लिया। जीवन के प्रति उसके नितांत व्यावहारिक दृष्टिकोण से कभी-कभी अशोक आश्चर्यचकित रह जाता। कोचिंग के सहपाठी कहते, ‘आई.ए.एस. की कोचिंग के साथ बी.एड., क्या कंबीनेशन है।’

‘कंबीनेशन तो जीवन और नौकरी का होना चाहिए। फिर वह चाहे स्कूल टीचिंग हो चाहे कलक्टरी।’

अशोक खुलकर कुछ नहीं कहता, पर मन-ही-मन नीरजा की बात सुनकर सोच में पड़ जाता। नौकरी और जीवन के संतुलन की बात ने उसे प्रभावित किया। दोनों ने साथ-साथ करीब-करीब सारी प्रतियोगी परीक्षाएँ दीं, परंतु नतीजा हर बार निराश करता रहा। यू.पी.एस.सी. की परीक्षा का आखिरी चांस जब निकल गया तो अपने कई अन्य सहपाठियों की तरह अशोक भी हताश हो गया। नीरजा से बोला, ‘ये सिविल सर्विसेज की महत्त्वाकांक्षा हर साल कितने बेरोजगार पैदा कर देती है।’

‘बेरोजगार क्यों, रोजगार के और भी तो कितने तरीके हैं।’

‘हैं, मगर इस चक्कर में बाकी नौकरियों के मौके भी निकल जाते हैं।’

‘सो तो है, पर फिर भी हमें हिम्मत नहीं हारनी चाहिए।’

नीरजा की बात पर ध्यान दिए बिना कहीं दूर शून्य में देखता हुआ बोला अशोक।

‘रेणु ने मैला ‘आँचल उपन्यास’ में लिखा है, ‘बेजमीन आदमी भी कहीं आदमी है, वह तो जानवर से भी बदतर है। आज मुझे लग रहा है, उस पंक्ति को नई तरह से लिखूँ कि बिना नौकरी के आदमी भी कोई आदमी है वह तो जानवर से भी बदतर है।’

‘अरे यह कैसी बात, ऐसा थोड़े ही होता है।’

‘आज के जमाने की सच्चाई यही है नीरू। आगे क्या होगा, सोच नहीं पा रहा हूँ।’

‘अच्छा सोचो, अच्छा ही होगा।’

‘कैसे होगा बताओ, बिहार के निम्न-मध्यम वर्गीय परिवार का बड़ा बेटा हूँ, माँ-बाप ने बड़े अरमानों से दिल्ली पढ़ने भेजा था कि बेटा अब कलक्टर बनकर ही घर लौटेगा। कलक्टर तो क्या, क्लर्क भी नहीं बन पाया। अब क्या मुँह लेकर जाऊँ।’

‘अरे, अपने घर जाने में क्या सोचना!’

‘सोचना पड़ता है नीरू, हजारों खर्च करके पढ़ाने-लिखाने के बाद खाली हाथ घर लौटे बेरोजगार बेटे का कोई स्वागत नहीं करता।’

‘गजब, अपने घर में क्या स्वागत क्या अपमान, आगे के लिए भी तो सोचना है।’

‘समझ नहीं पा रहा हूँ, पिछली बार जब घर गया था तो बाऊजी बहुत नाराज थे, मुझसे बोले, यहीं रहकर कुछ ट‍्यूशन वगैरह कर लो, तुम्हारा दिल्ली का खर्चा हम और नहीं उठा सकते, हमारे और भी तो बाल बच्चे हैं।’

‘फिर।’

‘मैं नहीं माना, दिल्ली लौट आया, उन्होंने खर्चा देना बंद कर दिया। पिछले दो साल से किसी तरह ट‍्यूशन करके गुजारा कर रहा था। एक उम्मीद थी, आज वह भी टूट गई।’

‘ऐसी बात नहीं है, और भी तो जॉब हैं। तुम्हारा तो यू.पी.पी.सी.एस. का चांस भी अभी बाकी होगा, मेरा तो वह भी खत्म हो गया है।’

‘है तो सही, पर मैं फिर से मृगतृष्णा में नहीं पड़ना चाहता।’

‘मृगतृष्णा क्यों, अगर चांस बाकी है तो हमें कोशिश जरूर करनी चाहिए।’

‘अब मुझमें हिम्मत नहीं है, खो गई है।’

‘नहीं है तो हिम्मत जुटानी पड़ेगी, इतना तो तुम भी जानते हो कि हमें इतना गरीब कभी नहीं होना चाहिए कि श्रद्धा और सब्र दोनों खो दें।’

‘इतनी हिम्मत कहाँ से बटोर लाती हो तुम। आई.ए.एस. का चांस तो तुम्हारा भी समाप्त हो गया है। अब आगे क्या सोचा है, तुम्हारे परिवार वाले तुमसे असंतुष्ट नहीं होंगे?’

‘लो उन्हें फुरसत कहाँ है असंतुष्ट या संतुष्ट होने की, सभी अपने-अपने काम में लगे हैं।’

‘तुम्हारे घर में कोई बेकार नहीं है।’

‘बेकार, काम ही इतना ज्यादा है, दूध का काम है, सब उसी में लगे हैं।’

‘यानी कि बिजनेस।’

‘नहीं इसे बिजनेस तो नहीं कहा जा सकता। भाई को जब पढ़-लिखकर नौकरी नहीं मिली तो उसने बैंक से लोन लिया और अपनी एक छोटी से डेयरी खोल ली। फिर मेरे माता-पिता भी उसका हाथ बँटाने लगे और काम ठीक ही चल निकला।’

‘दिल्ली का खर्चा उठाने में उन्हें कोई परेशानी नहीं होती।’

इस बार नीरजा गंभीर हो गई, बोली, ‘वो तो कुछ नहीं कहते, पर अब भाई का विवाह हो गया है, उनकी अपनी जिम्मेदारियाँ हैं, मुझे उनसे पैसे लेने में संकोच होता है, पर अब वह परेशानी भी दूर हो गई है।’ नीरजा की आँखों की चमक फिर लौट आई।

‘मतलब तुम वापस अपने घर लौट रही हो।’

‘अरे नहीं, वह मैंने टी.ई.टी. की परीक्षा दी थी, मुझे बेसिक एजुकेशन में नौकरी मिल गई है।’ वर्षों तक आई.ए.एस. बनने की आशा भरी नीरजा की आँखें देखता आ रहा था अशोक, उन आँखों में बेसिक एजुकेशन की टीचर बनने के बाद इतनी चमक कौंधती देखकर वह हैरान रह गया, उसे नीरजा की बात याद आ गई, ‘कंबीनेशन तो नौकरी और जीवन का होना चाहिए।’ नीरजा की खुशी में शामिल होने की कोशिश करता हुआ बोला।

‘अच्छा लगा सुनकर, कब ज्वॉइन करना है?’

‘एक हफ्ते बाद।’

‘कहाँ पो‌स्टिंग हुई है?’ ऊपर से बोला अशोक, पर मन में आया डूबते को तिनके का सहारा ही सही, उसके पास तो वह भी नहीं है। अशोक के स्वर की उदासी को भाँप गई नीरजा, अचानक बोल पड़ी

‘मेरी पोस्टिंग मेजा में हुई है।’

‘मेजा।’ आँखों में प्रश्न भरकर पूछा अशोक ने।

‘हाँ, इलाहाबाद के पास छोटी से तहसील है मेजा, वहीं तुम भी चलो मेरे साथ।’

‘मैं, भला मैं कैसे जा सकता हूँ, पागल हो क्या।’

‘क्यों नहीं जा सकते?’

‘पर मैं वहाँ करूँगा क्या?’

‘वही जो यहाँ करते हो, कोचिंग।’

‘अब और कितनी कोचिंग करूँगा मैं?’

‘अरे, बाबा, मैं कोचिंग करने की नहीं, कोचिंग देने की बात कर रही हूँ।’

‘मतलब?’

‘मतलब यह कि तुम्हारा साइंस का बैकग्राउंड है, आज भी इलाहाबाद में ढ़ेरों छात्र-छात्राएँ प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करने आते हैं।’

‘वहाँ के कोचिंग वाले मुझ जैसे फेलियर को अपने यहाँ क्यों रखेंगे?’

‘फिर वही बात, फेलियर क्यों, कोचिंग वालों को अच्छे स्कॉलर की हमेशा तलाश रहती है।’

‘स्कॉलर और मैं, मजाक कर रही हो।’

‘बिल्कुल नहीं, मजाक क्यों करूँगी, तुम चलो मेरे साथ।’ सफाई देने की आदत नहीं थी नीरजा को। अपनी बात पर कायम रहना जानती थी।

उसके बाद घटनाक्रम तेजी से बदले। नीरजा जब मेजा ज्वॉइन करने गई तो अशोक साथ गया। इलाहाबाद रुककर वहाँ का जायजा लेने पर अशोक को लगा कि यहाँ सबसे ज्यादा जरूरत हाईस्कूल और इंटर के बच्चों के ट‍्यूशन की है। नीरजा ने तय किया कि निवास-स्थान इलाहाबाद में ही रहेगा, वहीं से वह मेजा आना-जाना कर लेगी। दोनों ने आर्य समाज मंदिर में विवाह कर लिया। करछना में रहने वाले नीरजा के परिवार को कोई आपत्ति नहीं हुई। अशोक का बिहार के समस्तीपुर में रहने वाले अपने जिस परिवार से संबंध टूट चुका था, वहाँ से पिता का फोन जरूर आया, यह कहने के लिए कि ‘नकारे तो तुम थे ही, विजातीय विवाह करके आज से तुम हम लोगों के लिए मर गए।’

धीरे-धीरे तीन साल बीतने को आए। नीरजा की नौकरी और अशोक का कोचिंग सेंटर दोनों चलते रहे। पी.सी.एस. की परीक्षा का यह आखिरी चांस था, इस बार प्रारंभिक परीक्षा पास करने के बाद मुख्य परीक्षा की तैयारी के लिए नीरजा ने जिद कर अशोक का कोचिंग सेंटर कुछ महीनों के लिए बंद करवा दिया। साक्षात्कार के बाद अशोक फिर से अपने कोचिंग सेंटर में व्यस्त हो गया। एक तरह से मन-ही-मन उसने अपनी नियति स्वीकार कर ली थी। नीरजा इस बात को समझती थी, माहौल हलका करने का प्रयास करती, कहती, ‘मुझे तो लगता है अशोक कंपीटीशन कभी-कभी अँधेरे में तीर लगने की तरह भी होता है।’

‘होता होगा।’

‘एक से एक मेहनती और टैलेंटेड लोग भी क्वालीफाई नहीं कर पाते हैं।’

‘फिर भी हर साल सैकड़ों कैंडीडेट क्वालीफाई करते ही हैं।’

‘अरे सभी इंटेलिजेंट ही हों जरूरी नहीं है, कभी-कभी अंधे के हाथ भी बटेर लग जाती है।’ नीरजा हँस पड़ती तो अशोक देखता रह जाता। आई.ए.एस. बनने का लक्ष्य रखने वाली, अथक मेहनत करने वाली नीरजा प्राइमरी स्कूल की टीचर बनकर खुश रहती है, संतुष्ट रहती है। देखकर सदा गमगीन रहने वाला अशोक धीरे-धीरे हँसने-मुसकराने लगा था। नीरजा सुबह पाँच बजे उठती, गुनगुनाती हुई घर के काम-काज निपटाती, अशोक का भोजन रखती और अपना टिफिन लेकर साढ़े छह बजे की बस पकड़कर स्कूल के लिए निकल जाती। शाम होने से पहले लौट आती, खुश होकर कहती, ‘देखो अशोक, आज सब्जी मार्केट में कितनी अच्छी भिंडी मिल गई, तुम्हें पसंद है न, सुबह बनाऊँगी, अरे हाँ, मेरी पत्रिका आ गई क्या, इस बार देर हो गई।’

अशोक नीरजा को देखकर सोच में पड़ जाता, नीरजा को खुश रहने के लिए कभी बड़ी चीजों की जरूरत नहीं पड़ती, मनपसंद सब्जी, मनपसंद पत्रिका का नया अंक उसे खुश कर देता, पर अशोक के चेहरे की एक शिकन उसे परेशान कर देती। अशोक का परिणाम जानने के लिए उसके मन के भीतर आँधी चल रही है। नीरजा के शांत चेहरे को देखकर अशोक इसका अनुमान नहीं लगा पाता। आज अशोक का परिणाम देखने के बाद नीरजा के मन के भीतर चल रही आँधी शांत होने लगी, घर लौटते वक्त एडवोकेट हनुमानजी के मंदिर जाकर पूरे मन से अपने हाथ जोड़े, लड्डू का डिब्बा लेकर जब घर पहुँची तो अशोक इंतजार कर रहा था, नीरजा को देखकर बोल पड़ा—

“तो मैडम, आज भिंडी और कटहल की जगह लड्डू ले कर आई हैं।”

‘वो आज मटर-पनीर, कोफ्ते और आईसक्रीम खाने की इच्छा है न, इसलिए, वो भी कान्हा-श्याम होटल में।”

‘और इतना सारे लड्डू का क्या करोगी?”

‘आपके कोचिंग के बच्चों को दूँगी, कल सुबह स्कूल के लिए नया डिब्बा लूँगी, वहाँ भी सबका मुँह मीठा कराना है, पर पहले यह पहला लड्डू आप खाओ।”

शाम होते-होते कोचिंग के बच्चे आ गए, अपने शिक्षक की सफलता पर खुश हुए, फिर बोले—

‘अब तो आप चले जाएँगे सर, हमें कौन पढ़ाएगा?”

‘अरे मैडम है न, मैडम पढ़ा देंगी।” दूसरा छात्र बोला।

‘अरे बच्चों! मैं ठहरी साहित्य पढ़ने और पढ़ाने वाली, मेरे लिए तो साइंस और मैथ्य काला अक्षर भैंस बराबर हैं।” नीरजा अशोक का महत्त्व बताने का एक मौका नहीं चूकती थी, सुनकर सहज भाव से बोला अशोक—

‘इसलिए तो पी.सी.एस. एलाइड्स पर आकर ठहर गया।”

‘अब वह तो हमारे मन पर निर्भर करता है, मैं तो मानती हूँ, मन के हारे हार है, मन के जीते जीत। एक अच्छा और सुरक्षित जीवन हमारी प्रतीक्षा कर रहा है, खुश रहने के लिए और क्या चाहिए।”

‘तुम सही कही रही हो, मन चंगा तो कठौती में गंगा। अब जीवन की एक दिशा तय हो गई, एक ठहराव आ जाएगा।”

नीरजा की खुशी की आँच अशोक को छू गई, नया-नया जागा हुआ आत्मविश्वास और सकारात्मकता नीरजा को बहुत भला लगा, यही तो वह हमेशा से चाहती थी अशोक के लिए।

परिणाम आए हुए एक हफ्ता बीत गया। अशोक ने अपने कोचिंग के घंटे बढ़ा दिए, ट्रेनिंग में जाने से पहले वह बच्चों का कोर्स पूरा करा देना चाहता था। इलाहाबाद में उनकी जो एक छोटी सी दुनिया थी, सामाजिक परिवेश था, उन सभी ने उन्हें शुभकामनाएँ दीं। बीच में कई बार अशोक को अपने परिवार की याद आई, संपर्क करने की इच्छा होते हुए भी चाह जब्त कर गया। परिवार के लिए मर जाने की बात उसके दिल में फाँस बनकर अटक गई थी। नीरजा चाहकर भी उस फाँस को निकाल नहीं पा रही थी।  मन-ही-मन वह समझती थी कि अशोक का विजातीय विवाह कर लेना उसके रूढ़िवादी माँ-बाप कभी स्वीकार नहीं कर पाएँगे। पर दोनों को पता नहीं था, एक अप्रत्याशित संयोग उनके द्वार पर दस्तक देने वाला है।

शाम के वक्त अचानक डोर-बेल की जगह दरवाजा खटखटाने की जब आवाज आई तो दोनों चौंक उठे। अशोक के पास उसके छात्र बैठे थे। नीरजा रसोई में थी। घड़ी भर बाद दरवाजा और जोर से खटखटाया गया, लपककर एक छात्र ने दरवाजा खोला तो बाहर से रोबदार आवाज आई! ‘ई असोक का घर है?”

‘जी!” छात्र सकपका गया।

‘तुम कउन हौ?”

‘जी मैं-मैं...।”

‘क्या मैं-मैं, पूछते हैं तुम कउन हो जी, अउर उ असोक कहाँ है?’

तब तक अशोक अपने बाबूजी की आवाज पहचान गया, एक छलाँग में दरवाजे पर पहुँचा और बोला, ‘बाऊजी आप!’

‘हाँ हम हैं, ये छोकरा कउन है, दरवाजा रोके खड़ा है, तुम्हारा नौकर।”

‘नहीं-नहीं, नौकर नहीं है, मेरे पास पढ़ने आता है।” तब-तक बाकी छात्र अशोक की आँखों का संकेत समझकर अपनी किताबें समेट चुके थे, उन्हीं के साथ द्वार खोलने वाला छात्र भी चुपचाप निकल गया। नीरजा रसोई के दरवाजे पर आकर खड़ी हो गई थी, छोटी सी बैठक का सीन देखकर भौचक रह गई। चार आगंतुक थे, अशोक के माता-पिता, छोटा भाई और बहन। अशोक की माँ अशोक को हाथ पकड़कर धारों-धार रो रही थीं, ‘हाय रे मोरा बाबू!”

‘बस-बस अब रोना-धोना बंद करो, खुसी के मउके पर आई हो, काहे रोना-धोना फैलाय रही हो?”

‘का कहें, एतने दिन बाद बाबू को देख के रहा नहीं गया।”

अशोक के भाई-बहन बड़ी उत्सुकता से बैठक का मुआयना कर रहे थे, नीरजा को देखकर बहन ने हाथ के संकेत से माँ को बताया।  नीरजा को देखते ही माँ के आँसू सूख गए, पिता व्यस्त भाव से खिड़की के बाहर देखने लगे, दोनों भाई-बहन माता-पिता की प्रतिक्रिया की प्रतीक्षा करते रहे, अशोक बोला, ‘माँ, ये है नीरजा।’

‘ओ तो ई है करछना वाली।”

नीरजा ने झुककर पाँव छुए, तो बोलीं, ‘हाँ-हाँ खुस रहो।’

पिता बोले, ‘ठीक है, ठीक्के है।”

दोनों भाई-बहन ने सामान्य रहने की कोशिश की, भाई बोला, ‘हैलो आयम, मुकेश, अशोक भैया का छोटा भाई।’

बहन बोली, ‘हाय मैं मीरा, अशोक भैया की इकलौती बहिन, भइया हमको जान से ज्यादा चाहते हैं।’ अशोक के जीवन में अपना महत्त्व बताते हुए बोली मीरा।

नीरजा दोनों से बहुत खुश होकर मिली, बोली, ‘आप लोग खड़े क्यों हैं, बैठिए न पापा जी!’

‘हाँ-हाँ उ त बैइठेंगे ही, अपना ही घर है।’ नीरजा के मुँह से ‘पापाजी’ सुनकर उनकी भृकुटी जरूर तन गई। बहन अंदर के कमरे में झाँक आई, माँ से बोली, ‘माँ अंदर चलकर लेटो न, बेडरूम में।” माँ उसके साथ अंदर चली गई, पिता बैठक में बिछे तख्त पर लेट गए, भाई अशोक की टेबल पर रखीं किताबें उलटने-पलटने लगा, अशोक
चुपचाप किंकर्तव्यविमूढ़ सा खड़ा का खड़ा रह गया। लगभग पाँच साल बाद अपने पूरे परिवार को सामने देखना, वह भी इतने आत्मीय रूप में, उसे मानो शॉक दे गया। नीरजा ही उसे बुलाकर रसोई में ले गई, थैला पकड़ाकर धीरे से बोली, ‘थोड़ा सामान ला दीजिए, भोजन बनाना है, थोड़ी मिठाई भी ले लीजिएगा।’ नीरजा को एकदम सामान्य देखकर उसे दूसरा शॉक लगा, चुपचाप सर हिलाते हुए वह बाजार चल दिया।

बहन रसोई में आई, ‘क्या कर रही हो भाभी, चाय बना रही हो?’

‘हाँ, बस हो गया।’

‘लाओ मैं सबको देती हूँ।’

‘इहे दू कोठरी का घर है, ई में गुजारा कईसे होता है भाई।’ माँ चाय लेते हुए बोली।

‘इसी में भाई ट‍्यूशन भी करते हैं।’

‘हाय रे मोरा बच्चा, कउनो तरहे गुजारा कर रहा था, पर अब तो भगवान ने हमारा सुन लिया, दिने बदल गया।’

‘तुम्हरे बरत, उपवास, पूजा-पाठ का फल है असोक की माँ, कि असोक इतना बड़का अफसर बन गया।’ नीरजा को पूरी तरह से अनदेखा करते हुए बोले अशोक के पिता।

‘हाँ, केतना दुबरा गया है, मुँह सूखकर एतना सा रह गया है।’

‘तो अब तुम आय गई हो न, जी भर के खिलाना-पिलाना।’

‘सो तो करबे करेंगे, इहो कउनो कहने का बात है।” रात का भोजन समाप्त होते-होते उन सबकी बातचीत से नीरजा को बहुत सी जानकारी मिल गई। कैसे अशोक बचपन से होनहार था, कैसे अपना पेट काटकर उन्होंने उसे दिल्ली रखकर पढ़ाया-लिखाया। वो सब तो हमेशा से जानते थे कि अशोक एक दिन बड़ा अफसर बनेगा। वह तो बीच में अशोक सब छोड़कर इलाहाबाद आ गया और परिवार को एकदम भूल गया। माँ-बाप को विश्वास था कि थोड़ा भटक गया है, पर जल्दी ही रास्ते पर आ जाएगा, आखिर अपना खून अपना ही होता है। नीरजा निर्विकार भाव से काम में व्यस्त थी, अशोक ने उसके चेहरे को देखा, आखिर पूछ ही लिया—

‘तुम लोगों को मेरा पता कैसे मिल गया?’

‘अरे, मेरा दोस्त है न किशोर, यहीं नैनी में बी.एस.सी. ए जी में पढ़ता है, रिजल्ट निकलने के बाद सबसे पहले उसी ने फोन करके बताया, उसी ने सब बताया। बीच-बीच में फोन करता रहता है, आपका खोज-खबर देता न रहता है।’ मुकेश हड़बड़ा कर बोल उठा।

तो परिवार उसकी पूरी जानकारी रखता था, उसकी दीन-हीन स्थिति जानकर भी कभी संपर्क करने की कोशिश नहीं की। मन का एक कोना फिर उदास हो गया। परिवार की आर्थिक स्थिति उसे इतनी बुरी नहीं लग रही थी। दोनों भाई-बहन के पास अत्याधुनिक स्मार्ट फोन थे, पिता का फोन अवश्य पुराने मॉडल का था। सामान रखने के लिए बड़े-बड़े ट्रॉली बैग, भोजन का बड़ा सा हॉटकेस, पानी के थर्मस। पूरी तैयारी से यात्रा की थी उन्होंने। पिता की पेंशन के साथ गाँव में अच्छी खेती-बाड़ी थी, घर की दो मंजिल का किराया आता था, एक पर परिवार रहता था। अशोक का परिवार उस क्षेत्र के खाते-पीते परिवार में गिना जाता था। न चाहते हुए भी उसे याद आ गया दिल्ली में कई बार पैसे के अभाव में एक पैकेट ब्रेड खाकर पूरे दिन गुजारा करना पड़ा था। किसी के घर का सर्वेंट क्वार्टर दो लड़कों के साथ मिलकर किराए पर लिया था, उसमें भी किराया कभी समय पर नहीं दे पाता। जाने कितनी बातें याद आने लगीं। नीरजा हमेशा कहती है, ‘हमें अतीत में नहीं जीना चाहिए।’ उसने अतीत की बातों को भुलाने की कोशिश की, पर उसके माता-पिता अतीत से निकल ही नहीं पा रहे थे, माँ फिर बोल पड़ीं—

‘कोउनो दिवाली छठ ऐसा नहीं बीता कि बाबू का याद नहीं आया, पूजा-पाठ करते हुए आँख-कान तो दरबज्जे पर लगा रहता था कि मोरा बाबू अब आया तो तब आया।”

अशोक नहीं कह सका कि घर जाने के लिए जेब में ट्रेन के किराए के पैसे नहीं होते थे। रात अधिक हो गई थी, मुकेश जम्हाई लेते हुए बोला, ‘अब सोने का व्यवस्था किया जाए, भोरे-भोर हमको नैनी जाना है।’

‘नैनी क्यों?”

‘उ किशोर से मिलकर जरा एडमीशन का पता लगाना है।”

‘वहाँ कंपीटीशन है।”

‘आरे तो देगा न कंपीटीसन, ई मुकेस कोउनो से कम है क्या, आखिर तुम्हारा भाई है।’ माँ का आत्मविश्वास झलक उठा।

‘अउर अब तो तुम थोड़ा पैरवी भी कर ही सकते हो, तुमको कउन मना करेगा।’ पिता माँ की तरह जल्दी उत्तेजित नहीं होते थे, सोच-विचार कर बोलते थे।

‘और क्या, इसलिए ही न एतना जल्दी में आए हैं हम लोग।’ मुकेश आने का प्रयोजन बताने से नहीं चूका।

‘अरे उ लड़की वाले भी त पहुँचने लगे थे, न जाने उनको कईसे मालूम हुआ।” मीरा से बोले बिना रहा नहीं गया।

‘आरे अब उनको क्या मालूम कि इहाँ त हाले दूसर है।’ आखिर माँ के मन की टीस जाहिर हो गई।

इसके पहले कि अशोक कुछ कह बैठता, नीरजा ने बात सँभाल ली, बोली, ‘आप सब थक गए होंगे, अब आराम कीजिए। अशोक, तुम भी सो जाओ, सुबह बच्चे आ जाएँगे।’

‘माँ-बाप के सामने बहुरिया उनके बेटे का नाम लेकर बुला रही है, उनका गुस्से के मारे आग हो जाना एकदम जायज था, माँ बोलीं, ‘बच्चे, कउन बच्चे?’

‘वो ट‍्यूशन पढ़ने वाले।’

‘अब उन सबको पढ़ाने का क्या जरूरत है, अब अपने दोनों भाई बहिन को देखो। इनको रास्ता लगाना जरूरी है, आखिर बड़ा भाई बाप के समान होता है।’ पिता ने अशोक को उसका कर्तव्य बता दिया।

अशोक को जवाब नहीं सूझा, जो अशोक तीन साल पहले परिवार के लिए मर चुका था, वही अशोक आज बाप-भाई सब बन बैठा। नीरजा की बात याद आई।

‘कुछ संबंध सही गलत से परे होते हैं अशोक, वे बस होते हैं, इसके पीछे कोई तर्क नहीं होता।’ नीरजा को वह जानता था। गृह-कलह का डर उसे नहीं था, पर परिवार की महत्त्वाकांक्षा ने स्वयं उसके भीतर थोड़ा भय पैदा कर दिया था।

सुबह और दिनों की अपेक्षा नीरजा थोड़ा जल्दी उठ गई, रसोई का काम-काज निपटाकर साढे़ छह बजे तक स्कूल जाने के लिए तैयार हो गई। अशोक को छोड़कर पूरा परिवार सो रहा था, सुबह नीरजा के काम में हाथ बँटाना उसकी आदत बन गई थी। जाने से पहले हाथ में चाय की ट्रे लेकर मीरा को आवाज दी, बोली, ‘मीरा मैं निकल रही हूँ, तुम लोग चाय पी लो।’

‘एतना भोर में कहाँ जा रही हो?’ माँ को अपनी जिम्मेदारी और अधिकार का एहसास था।

‘जी, स्कूल के लिए निकल रही हूँ। साढ़े सात बजे स्कूल शुरू हो जाता है।’

‘तो अभी तो छौ ही न बजा है।’

‘जी स्कूल पहँचने में करीब एक घंटा लग जाता है।’

‘अब आज ईस्कूल जाना कउनो जरूरी है, छुट्टी ले लो।’

‘जी मैं ले लेती, पर क्या करूँ, स्कूल में परीक्षा चल रही है।’

‘तो आना कब होगा?’

‘डेढ़ बजे छुट्टी हो जाती है, तीन बजे तक आ जाऊँगी।’

‘तीन बजे, और तब तक घर का काम-काज, उ किसका जिम्मेवारी है?’

‘जी नाश्ता, खाना सब बनाकर रख दिया है।’

‘उ त समझे, पर एतना भोर में बना खाना दुपहर में बासी न हो जाएगा।’

‘जी भोजन फ्रीज में रख दिया है, नाश्ता लगा हुआ है। दोपहर में खाने से पहले मीरा गरम कर लेगी। कुछ और खाने की इच्छा हो तो रसोई में सब सामान है।’

‘सामान है तो मीरा काम करेगी, आरे उ पढ़ने-लिखने वाली लड़की है, पानी का गिलास उठाकर नहीं पीना पड़ता है उसको। उ ईहां इलहाबाद बीस विद्यालय में पढ़ने आई है कि चौका बरतन करने?’ यह अशोक के लिए दूसरी सूचना थी।

‘जी अशोक तो रोज यही करते हैं मम्मीजी, इसलिए मैंने सोचा...।’

यह सुनकर माँ का पारा अगर सातवें आसमान पर प‌हुँच गया तो अवश्य दोष उनका नहीं है, एक तो उनके बाबू अशोक का नाम ऐसे लेती है, मानो सिर में तेल डालकर उसे पाला-पोसा हो, ऊपर से मम्मीजी, पापाजी, माँजी, बाबूजी नहीं। नः, बहुत हो गया फैशन, इस मास्टरनी को पत्नी होने का मतलब बताना जरूरी है। तेज स्वर में बोली, ‘बाबू खाना पकाता है, इहे दिन देखने के लिए उसको पाले-पोसे, पढ़ाए-लिखाए?’

‘जी पकाना नहीं पड़ता है, केवल जरूरत पड़ने पर...।’

‘अरे, काहे का जरूरत, हमहूँ तो सुनें जरा, अरे पत्नी आखिर होती काहे के लिए है, उसका काम क्या है, तुमको मालूम नहीं कि पत्नी का एक रूप माँ का भी होता है। पति को माँ का तरह भोजन कराना उसका धरम है। उ इसलोक नहीं जानती हो क्या करमेसु दासी, भोजयेसु माता...और...और... क्या तो है भाई?’

मीरा माँ को अटकते देखकर आगे बढ़ आई, घर के काम-काज का बोझ अपने ऊपर पड़ने का डर भी उसे था, चट अपना स्मार्ट फोन खोलकर गूगल पर श्लोक ढूँढ़ लिया, सस्वर पाठ करने लगी—

‘कार्येसुमंतरी, करनेसु दासी, भोज्येसु माता, सयनेसु रम्भा।

धर्मानुकूला क्षमया धरिती। भार्या च सडगुनवतीह दुरलभा।।’

नीरजा अपने को जब्त किए हुए सुनती रही, अभी क्लास के किसी बच्चे ने ऐसे सुंदर श्लोक का गुड़-गोबर किया होता तो उसे टोकते देर नहीं लगती।

‘स नहीं ष, मंतरी नहीं मंत्री, धरती नहीं धरित्री, अशुद्ध उच्चारण भाषा को दूषित कर देता है। सडगुन नहीं षडगुण, दुरलभा नहीं दुर्लभा।’

पर इस समय तो चुप रहना ही उसे अपना परम धर्म लगा। मीरा उत्साहित होकर बोल उठी।

‘पत्नी में इन छौ गुन का बात कहा गया है जो कि दुरलभ होता है।’

‘सो तो होता ही है, दुर्लभ तो है ही, सब अपना-अपना भाग है अउर क्या।’ पिता के दुःख और आक्रोश का अंत नहीं था, आखिर इस करछना वाली के चलते वे अपने समाज के मोस्ट एलिजेबल बैचलर के पिता बनते-बनते रह गए थे।

‘हाँ सुन लो, कुछ सीखो मीरा से, पत्नी को कैसा होना चाहिए, खाली मास्टरी करने से कुछो नहीं होता है।’

बहुत देर से घर का पुरुष वर्ग महिलाओं के बीच हो रहे शास्त्रार्थ का आनंद ले रहा था। आखिर कल शाम से मूक दर्शक बने हुए अशोक के बोल फूटे, रातभर मन में चल रहे आत्ममंथन का असर उसके स्वर में झलक उठा, ‘नौकरी करके भी ये छह गुण निभाए जा सकते हैं मीरा।’ माँ को लक्ष्य करने की हिम्मत नहीं कर पाया, मीरा का नाम लेना पड़ा।

‘उ कईसे, उसके लिए समय कहाँ है, पैसा कमाना ही सबकुछ है क्या?’ माँ के स्वर की टन-टन कायम थी।

‘पैसा सब कुछ तो नहीं, पर बहुत कुछ है माँ, बिना अर्थ के आदमी भी कोई आदमी है।’

‘अर्थ माने?’ हर बात में टपक पड़ना मीरा की आदत थी।

‘समझ लो पैसा।’ अशोक का गंभीर स्वर गूँज उठा।

‘आरे आदमी काहे नहीं है बाबू, तुम्हरे आगे-पीछे कउनो नहीं है क्या?’

‘सभी हैं माँ, जिंदगी कब किसको किस हाल में, किसके सामने ला कर खड़ा कर दे कौन जानता है।’

‘आरे ऐसा काहे बोलते हो?’ पहली बार पिता का स्वर मुलायम पड़ा।

अशोक ने जैसे पिता की बात सुनी ही नहीं, जाने किस नशे में, अपनी ही रौ में कहता रहा, ‘पत्नी में ये छह गुण होने के साथ-साथ अगर वह आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर हो तो संकट आने पर पति के लिए वह पिता, भाई और मित्र भी बन जाती है। जीवन में जरूरत तो हर रिश्ते की होती है। क्या हर्ज है अगर पत्नी में छह गुण होने की जगह नौ गुण हों। वह नवगुण युक्त भी तो हो सकती है।’ इतना कहते-कहते वह शायद हाँफ उठा।

कहना नहीं होगा, यह सुनकर बड़बोले पिता की बोलती बंद हो गई, माँ को साँप सूँघ गया, मीरा को लगा जरूर उसका भाई आज नशे में है, होश में रहने पर वह कभी ऐसी बेशर्मी कर ही नहीं सकता, वह भी माँ-बाऊजी से, माँ का गुस्सा गलत नहीं है। इस करछना वाली ने उसके सोने जैसे बेटे पर मंतर फूँक दिया है या नमक पढ़कर खिला दिया है।

छोटा भाई मुकेश चुप रहकर सबको तौल रहा था, सिर्फ नीरजा को लगा कि इस उमस भरी सुबह में बसंत ऋतु की मलय पवन आकर उसे छू गई है, मन को शीतल कर गई है, अपने भीतर नई ऊर्जा का आभास हुआ उसे।

पर पिता इतनी जल्दी हथियार डाल देने वालों में से नहीं थे, नौकरी खेती के अलावे सूद पर रुपए देने-लेने का काम भी करते थे, जिसकी जानकारी अशोक को नहीं थी। नफा-नुकसान से सँभालने में उन्हें समय नहीं लगता था, इसलिए बोल पड़े, ‘तुम्हारा मतलब है, अब पत्नी होने का अर्थ बदल गया है।’

‘बदला नहीं है, सिर्फ विस्तार मिल गया है।’

‘एक्के बात है, सनातन से चले आ रहे अर्थ को बदलने का जरूरत क्या है।’

‘समय के साथ अर्थ, संबंध सब बदलने लगते हैं बाऊजी।’ पिता के लिए अशोक का यह लहजा अपरिचित था।

अब मुकेश को बोलना जरूरी लगा। समझौते के सुर में बोला, ‘लेकिन इतने बड़े अफसर की बीबी को नौकरी करने की जरूरत क्या है, एस.डी.एम. ए.डी.एम., बनते देर नहीं लगेगी भैया को।’

‘हाँ और क्या, फिर ट्रांसफर पोस्टिंग का समस्या।’ मुकेश की बात से मीरा को सूत्र मिल गया।

‘सरकारी नौकरी है, नियमतः नीरजा का भी ट्रांसफर कराया जा सकता है।’

गजब, अपना छोटा भाई-बहिन को छोड़कर ई मास्टरनी का ट्रांसफर का बात, माँ गुस्से से उबल पड़ी—‘अब तुम नियम का बात क्या करते हो, अरे इसको जो दरमाहा मिलता है, उ त सब आने-जाने में, बनाव-सिंगार में नौकरे चाकर में खरच हो जाएगा।’

‘और क्या, कपड़े-लत्ते का मेंटनेन्स, पार्लर-वार्लर, पेट्रोल का खर्चा।’ मीरा भी जानकारी रखती थी।

‘मैं बस से जाती हूँ, मीरा।’

‘अरे, अब तक न जाती थीं, अब अफसर की बीबी बस से थोड़े ही चलेगी, माँ सही कहती है, कुछो पैसा नहीं बचेगा।’

‘बचेगा मीरा, कुछ बच जाएगा।’

‘क्या बच जाएगा भाभी?’

‘थोड़ा सा आत्मविश्वास, जरा सा आत्मसम्मान।’ नीरजा बेहद मीटे स्वर में बोल उठी।

‘आतमसमान, आतमविसवास, ई कउन बात हुआ भाई, हमको त समझे में नहीं आ रहा है।’ माँ बोली।

‘हम भी नहीं समझे भाभी।’

‘रुपए खर्च करके बाजार में नहीं मिलता, पर जीने के लिए जरूरी है मीरा।’ घड़ी पर नजर डालते हुए बोली नीरजा।

‘मुझे देर हो रही है, मैं चलती हूँ।’

‘चलो, मैं बाईक से तुम्हें छोड़ आता हूँ, बस से देर हो जाएगी, मीरा तब-तक तुम लोग नाश्ता कर लो।’

‘और आपके बच्चे?’

‘मैसेज कर दिया है, वे देर से आएँगे।’

अशोक ने अपनी बाईक निकाली, नीरजा सँभलकर बैठ गई, बाईक स्टार्ट हुई और मानो एक लय में अपने गंतव्य की ओर चल पड़ी।

 

उत्कर्षिणी

2/43, विपुल खंड, गोमती नगर

लखनऊ-226010 (उ.प्र.)

दूरभाष : 09415408476
—रश्मि कुमार

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