बेटा किसका

बनिए के बेटे ने ब्याह के तेरह दिन बाद ही मांगलिक मुहूर्त निकलवाकर बिणज-व्यापार के लिए दूर दिसावर जाने का निश्चय किया। उसकी घरनी लाज का घूँघट हटाकर जलते सुर में बोली, ‘‘घर में न सास-ससुर, न ननद और न देवर-जेठ। मुझे यहाँ किसके भरोसे छोड़कर जा रहे हैं?’’

धणी अचरज से बोला, ‘‘भरोसे किसके? तुम क्या दूध-पीती बच्ची हो, जो अकेले नहीं रह सकती?’’

घरनी बीच में ही बोली, ‘‘बच्ची होती तो कोई डर नहीं था। भला ये दूर रहने के दिन हैं? यों अधरबंब में छोड़ना ही था तो ब्याह किया ही क्यों?’’

‘‘लेकिन तुम्हें कमी किस चीज की है? तिमंजली हवेली। धन से भरे भखार। तिजोरी में अनमोल हीरे-मोती। अनगिनत गहना-गाँठा। चादर तानकर सोओ और मस्त रहो!’’

धणी से कैसी शरम! आखिर लाचार होकर उसने न कहने लायक बातें भी साफ-साफ कह दीं! मगर वह न माना। बनिया बिणज से मुँह मोड़ ले तो सात पीढि़यों की नाक कटती है। तिजोरी में कैद कंचन के आगे बेचारी काया के कंचन की क्या बिसात?

घरनी ने रोग-माँदगी की बात की तो उसने कहा कि हवेली के पीछे उसके बाल सखा सुनार का घर है। पुख्ता भुलावन दे दी कि वह सेठानी का कहा न टाले। बखत-बेबखत कैसा भी काम हो, वह कर देगा। ऐसे सच्चे मित्र बिरले ही मिलते हैं।

सेठानी ने ज्यादा हठ किया तो उसने फिर उसके रूबरू दो-तीन बार जोर देकर सुनार को घरवाली की पूरी भुलावन दे दी।

धणी के विदा होते ही सेठानी का रोम-रोम कालिंदर के उनमान फुफकारने लगा! कैसे चैन पड़े? आटा सानते हुए उस पर राम जाने क्या सनक सवार हुई, जो उबलती दाल की देगची बेवणी में उलट दी। चूल्हे में पानी डालते ही हिवड़े के अंगार दहक उठे! मेड़ी का किवाड़ खोलकर पलंग पर करवटें बदलने लगी। चारों पाये और चारों ईस-उपले बिफरे हुए कालिंदर की नाईं फन पटकने लगे। नशे में बौराई हुई सी सुनार की छत पर उतरी। निस्संकोच मेड़ी का किवाड़ खटखटाया।

सुनार अकचकाकर नींद से उठा, ‘‘कौन है?’’

आवाज सुन पड़ी—‘‘आधी रात को कौन हो सकता है!’’

उसने सुनते ही बोली पहचान ली। माथा ठनका! अटकते-अटकते बड़ी मुश्किल से कहा, ‘‘रात को किवाड़ नहीं खोलूँगा। यह तो मित्र के साथ घात होगा।’’

‘‘ये किवाड़ सूरज की बाट नहीं जोहते! फिर आपने अपने मित्र से कौल किया था कि आप कभी मेरा कहा नहीं टालेंगे!’’

उसके उपरांत रात के अँधेरे ने अपने तारे जड़े हाथों से आप ही आगल खोली! मेड़ी में आप ही घी के दीये जल गए। हल्का अँधेरा, हल्का उजाला। पलंग के चारों पायों पर मानो चार चाँद इमरत बरसा रहे हों।

पहली ही रात पलंग की मंशा पूरी होने पर सेठानी के आशा ठहरी। नौवें महीने उसकी कोख से मानो चाँद ही जनमा हो। दूज के चाँद की तरह वह कोख का चाँद भी बढ़ने लगा। घुटनों के बल चलते-चलते पाँवों पर चलने लगा। खेलने लगा। बोलने लगा। दौड़ने लगा।

चार बरस की जुदाई के दौरान सेठ ने दिसावर में खूब माया बटोरी। और इधर सेठानी भी पलंग की माया बटोरने में पीछे न रही!

जिस तरह अचीता गया था, वैसे ही एक दिन सेठ ने अचीते ही हवेली के आगे ऊँट झेकाया। सूरज आकाश के बीच चमक रहा था। सेठानी तीसरे तल्ले पर चाँद का इमरत पी रही थी! एकाएक ऊँट का अरड़ाना सुन पड़ा। जैसे तोप दगी हो!

सेठानी का बेटा चौक में खेल रहा था। किसी अपरिचित आदमी को हवेली का किवाड़ खटखटाते देखा तो दौड़कर पास आया, ‘‘किसे पूछ रहे हैं? क्या काम है?’’

सेठ ने उससे उल्टा सवाल किया, ‘‘तू कौन है?’’

छोरा अचरज से बोला, ‘‘यह मेरी हवेली है, लेकिन आप किसे पूछ रहे हैं, यह तो बताया नहीं?’’

सेठ सवाल पूछनेवाले छोरे का चेहरा टुग-टुग देखता रहा। चार बरस पहले देखा एक सलोना चेहरा उसकी आँखों के आगे टिमटिमाने लगा! बेटे का चेहरा माँ से कित्ता मिलता है! पर सेठानी ने समाचार क्यों नहीं दिया? ऐसी खुश खबरी उससे छुपाई क्यों?

सेठ उसे गोद में लेता हुआ बोला, ‘‘मैं इस हवेली का धणी और तेरा बाप। दिसावर बिणज के लिए गया था।’’

यह कहकर उसे लाड़ करने लगा। मगर बेटा रो पड़ा और उसकी गोद से उतरकर भाग गया। तभी सेठानी ने ड्योढ़ी का किवाड़ खोला। उसके सामने साक्षात् सेठ खड़ा था। और सेठ के सामने साक्षात् सेठानी खड़ी थी। एक क्षण के लिए तो सेठानी को सिर पर चमकता सूरज काला नजर आया, किंतु अगले ही पल उसने आपा सँभाल लिया। देह की समूची शक्ति जुटाकर मुसकराने की चेष्टा की! ऐसी हँसी रोने से भी ज्यादा दुःखदाई होती है! हँसी छलकाते हुए बोली, ‘‘बाईं आँख फड़कने का शगुन कभी झूठ नहीं होता। लेकिन आपने आने की खबर क्यों नहीं की?’’

‘‘सतवंती लुगाइयों को धणी के आने का आप ही पता चल जाता है। खबर करने की जरूरत क्या है?’’

सेठानी के कलेजे में जैसे तीर खुबा। मुँह फिराकर बड़ी मुश्किल से चेहरे के भावों को छुपाया। हवेली के धणी और सात फेरों के ब्याहता के आने पर सेठानी को रीत की लीक तो पीटनी ही थी। किंतु उसका मन पीछेवाले मकान में भँवरे की तरह डोल रहा था। बेमन से रसोई बनाई। गुड़ का मांगलिक हलुआ बनाया। पास बैठकर पंखा झलते हुए धणी को खाना खिलाया। सेठ को हलुआ घी-गुड़ से भी सवाया मीठा लगा। बरसों बाद खाने का ऐसा स्वाद आया।

ब्यालू के उपरांत सेठानी ने कैसे सेज के लिए बेसब्री दरशाई, उसकी माया वही जाने। उसके मना करते-करते जबरन दिसावर गए धणी से उसने न तो कोई शिकायत की और न रूठी। सोलह सिंगार करके सेज की रीत पूरी करने में भी कोई कसर न रखी। मगर सेठ को सेज का तेवड़ हलुए जैसा मीठा नहीं लगा। उल्टे मुँह कड़वा हो गया। माटी की लोथ से भला कैसे अंगरली का आनंद आता?

पलंग से उतरकर उसने एक ऐसा सवाल पूछा, जिसका जवाब बिरली लुगाइयाँ ही अपने धणी को दे सकती हैं। सेठानी को टालमटोल करते देखकर सेठ ने कहा, ‘‘डर मत, हम महाजन हैं। बड़े लोग हैं! गँवारों की तरह ऐसी-वैसी बातों पर बखेड़ा नहीं करते। गुस्से को दबाना जानते हैं। तुझे सुनार की कसम, मुझे सच-सच बता!’’

सेठानी के रोम-रोम में अंगारे भड़क उठे। यार की मर्यादा रखे या धणी की? धणी होता तो हाड़मांस के कंचन को छोड़कर माटी के कंचन का लोभ करता भला? आज कसम देनेवाले को दिसावर जाते वक्त सोचना था। कसम की पत रखने के लिए धणी को भी सच बताना होगा!

जैसे सहेली को बता रही हो, इस तरह उसने धणी को सारी बात बता दी। कुछ नहीं छिपाया। बड़े अचरज की बात कि सेठ ने भी सारी बात इस तरह सुनी, जैसे किसी दूसरी लुगाई के मुँह से सुन रहा हो। धन का लोभ और बिणज की समझ ऐसी ही होती है! इसमें अनहोनी कैसी?

उसी गंभीर और ठंडे सुर में सेठ ने सुनार से कहा, ‘‘तू मेरे बचपन का मित्र है। एक साथ खेले। एक साथ बड़े हुए। तुझे भाई से बढ़कर माना। तूने यह घात कैसे किया?’’

सुनार ने सोचा, भंडा फूटना था सो फूट गया। अब आनाकानी करने में कोई तुक नहीं। बेधड़क जवाब दिया, ‘‘लुगाई से बड़ा मित्र नहीं होता। जब वह घात करने से नहीं चूकी तो मेरी क्या जिनात! और तुम्हीं ने तो कहा था कि कभी उसका कहा न टालूँ। मैंने मना करने में कोई कसर नहीं रखी, परंतु वह नहीं मानी तो मैं क्या करता? मुझे दोष देना फिजूल है!’’

सुनार इत्ती समझदारी की बात करेगा, सेठ को सपने में भी इल्म न था। बोला, ‘‘मैं किसी को दोष नहीं देता। न सेठानी को, न तुझे। मैं तो अपने आपको भी दोष नहीं देता। जो होना था हो गया। लेकिन आपस में कोई विवाद न हो तो अच्छा है। तेरे अंश का होते हुए भी इसका बाप मैं कहलाऊँगा। मेरा बेटा मुझे दे दे। चार बरस का बेटा चार बरस पहले बिणज करना सीखेगा!’’

सुनार ने सोचा जब पोल खुल ही गई है तो असल बात के लिए शरम कैसी? कहा, ‘‘जब बेटा मेरा है तो कोई और इसका बाप कैसे हो सकता है? मैं अभी जिंदा हूँ। बेटे पर माँ से ज्यादा बाप का हक होता है। हर बात में लोभ अच्छा नहीं!’’

लेकिन सेठ किसी भी सूरत में लोभ छोड़ने को तैयार न हुआ। न ही सुनार ने गम खाया। आखिर सुनार इस बात पर राजी हुआ कि सेठानी न्याय करे सो कबूल! दोनों उसके पास गए। अपना-अपना हक जताया। सुनकर सेठानी की अकल चकरा गई! दुनिया थरपने से लेकर आज तक किसी लुगाई को ऐसा न्याय निपटाना नहीं पड़ा होगा!

भट्ठी में कितने ही पुराने लोहे का जंग भस्म हो जाता है। उसी तरह यह न्याय कबूल करके सेठानी के तमाम संस्कार जलकर भस्म हो गए। झूठी लाज-शरम परे हटाकर कहने लगी, ‘‘सेठ मेरे धणी हैं। सुनार मेरा वाहेला है। जब तुम्हीं को मुझसे फैसला करवाते और अपना-अपना हक जताते हुए लाज नहीं आई तो मैं ही लाज का मुखौटा क्यों ओढूँ? अब मुझे किसका डर?’’

फिर धणी की ओर देखकर कहने लगी, ‘‘तुम माया के लोभी लुगाई की देह का सौदा करने में भी नहीं चूके। फिर तुम्हें ब्याह करने का क्या हक है? बेटे पर हक जतानेवाले यों दिसावर नहीं जाते! मैं मान जाती तो सब दबा-ढका रह जाता। न होते हुए भी तुम इसके बाप कहलाते। लेकिन जब कुछ भी छुपा नहीं रहा तो मैं तुम्हें अपना धणी क्यों मानूँ? मैं तुम्हें अपना धणी ही नहीं मानती तो बेटे का बाप कहलाने का तो सवाल ही नहीं उठता।’’

उसके उपरांत उसी निस्संकोच भाव से उसने सुनार से कहा, ‘‘हम तीनों जानते हैं कि बेटा तुम्हारे बीज का है। खुद भगवान् पूछें तब भी मैं सच्ची बात से इनकार नहीं करूँगी। लेकिन मेरे बेटे पर बाप का हक जतानेवाला उसकी माँ को घर की धणियाणी माने तो मैं झगड़े का सही फैसला कर सकती हूँ!’’

सुनार का चेहरा स्याह पड़ गया। जैसे चील ने उसके गले से अनमोल हार झपट लिया हो! पाँव की अंगुलियों की ओर देखते हुए बोला, ‘‘बेटा मेरा है, सो मेरा ही रहेगा। मरकर भी किसी को नहीं दूँगा। लेकिन उसकी माँ की घर की धणियाणी बनाऊँ इत्ता मूर्ख मैं नहीं। जो अपने धणी की ही नहीं हुई, वह मेरी कब होगी? ऐसी छिनाल लुगाई को मैं अपने गले की हड्डी नहीं बनाऊँगा। यह तो बखत-बखत के दाँव हैं!’’

सेठानी को एकाएक भरोसा न हुआ। कोई आदमी का जाया ऐसे बोल भी उगल सकता है? भरोसा करे जैसी बात ही नहीं थी। मगर भरोसा करने के अलावा चारा ही क्या था! ऐसे भरोसे से बड़ा दुनिया में कोई दुःख नहीं!

वे झगड़ा निपटाने के लिए सेठानी के पास आए थे, परंतु मामला ज्यादा उलझ गया। सेठानी ने कहा, ‘‘कोख से जना बेटा जीते जी माँ की गोद नहीं छोड़ सकता। बेटा मेरा है और मेरा ही रहेगा!’’

बेहया लुगाई के मुँह से ये पुख्ता बोल सुनकर दोनों की मर्दानगी को ठेस लगी। इसका फैसला नहीं होगा, तब तक चैन से नहीं बैठेंगे!

देश के धणी राजा के सिवा इसका न्याय कौन कर सकता है? तीनों ने दरबार में फरियाद की। राजा न्याय के सिंहासन पर बैठा था। दीवान ने कहा, ‘‘क्या बात है, सच-सच बताओ! महाराज दूध-का-दूध और पानी-का-पानी कर देंगे। इस राज के न्याय से तो देवता भी डाह करते हैं।’’

सेठ ने कहा, ‘‘अन्नदाता, आपको मुद्दे की बात बताता हूँ। कुठौर पीड़ और ससुरजी वैद! क्या फरियाद करूँ! मेरे आँगन में उगी बेल बढ़ते-बढ़ते इत्ती बढ़ी कि उसका ताँता पड़ोसी सुनार के घर चला गया। संजोग से सुनार के घरवाले ताँते में फल लगा। वह फल तोड़कर खा गया। इसके लिए मैं कोई उजर नहीं करता। किंतु फल का बीज तो मुझे मिलना चाहिए। बीज का हकदार तो मैं हूँ। अन्नदाता, इसमें कुछ गलत हो तो जो कहें, जुरमाना भरने को तैयार हूँ।’’

सेठ ने सीधे न कहकर इशारे में बात समझाई तो सेठानी भी उसी लहजे में बोली, ‘‘गुनगुना दूध जावनी में डाला तो ध्यान आया कि घर में तो जावन ही नहीं है। जावन के लिए मैं सुनार के घर गई। जावन लाकर दूध जमाया। मैं नहीं डालूँ तब तक उसका हक तो छाछ में भी नहीं, लेकिन वह दही और माखन में हक जताता है। यह कहाँ का न्याय?’’

सुनार ने कहा, ‘‘अन्नदाता, मेरे पास एक अनमोल मोती था। पर संजोग से मेरे पास रखने लायक डिबिया नहीं थी। मैं मानता हूँ कि सेठानी ने मुझे मोती रखने के लिए डिबिया दी, परंतु उससे मोती उसका तो नहीं हो जाता?’’

उनकी अनोखी फरियाद सुनकर राजा और दरबारियों की अकल चकरा गई। बातें तो तीनों की ठीक लगती हैं। लेकिन फैसला क्या करें? खूब माथा पचाया, मगर कुछ समझ में नहीं आया, इनका न्याय नहीं सुलटाया तो सारे राज की शेखी झड़ जाएगी।

झरोखे में बैठी राजकुँवरी भी उनकी फरियाद सुन रही थी। राजा को गताघम में देखकर उसके पास आई और उसने खरा न्याय किया। बोली, ‘‘तुम तीनों ने इशारे-इशारे में अपनी फरियाद की और मैं सारी बात का मर्म समझ गई। मर्द इसका फैसला नहीं कर सकते। सच्ची बात न फल की है, न मोती की और न जावन की। फिर इन उपमाओं के इर्द-गिर्द माथा लड़ाने में कोई सार नहीं। वास्तव में कभी बेल के ताँत और मोती का मामला फँसे तो फिर आना। मैं सेठ को बीज की ठौर पूरा फल दिला दूँगी और सुनार को उसका मोती। डिबिया के बदले मोती कभी नहीं मिल सकता। परंतु झगड़े के बेटे पर फकत सेठानी का हक है। इसमें किसी ने चीं-चपड़ की तो खाल में लूण भरवा दूँगी! तुम दोनों के लच्छन पहचान लिये। कुशल इसी में है कि माँ को उसका बेटा सँभला दो!’’

विजयदान  देथा

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