आफत भरे दिन

आफत भरे दिन

पहले दो दिन तो आसन्न संकट के साये में ठीक-ठाक गुजरे, लेकिन तीसरे दिन कयामत बरपा हो गई। पुलिस का डंडा चलना शुरू हुआ तो फिर रुकने का नाम ही नहीं लिया। पूरा बाजार बंद करवा दिया, यहाँ तक कि पूजा की सामग्री और फूल बेचनेवाले भी भाग खड़े हुए। बाजार की जिस सड़क पर हमेशा जाम लगा रहता था, जहाँ पैदल चलना भी मुश्किल था, वह एकदम सूनी हो गई। मेडिकल स्टोर खोलने की इजाजत थी, मगर वह भी आधा शटर गिराकर बैठे थे।

गिरीश बाबू के बेटे ने बेंगलुरु से फोन पर कहा कि पापा अपनी बी.पी. वगैरह की रेगुलर दवाइयाँ कम-से-कम एक महीने की लेकर रख लीजिए। लॉकडाउन के खुलने का कोई भरोसा नहीं है। अभी इक्कीस दिन बोल रहे हैं, लेकिन ये बढ़ाते जाएँगे। चायना और इटली में महीनों से लगा है, मगर पेंडेमिक काबू नहीं आ रहा; अपने यहाँ फैलेगा तो फिर भगवान् ही मालिक है। उन्हें तुरंत ही बात समझ में आ गई, घर में बस पाँच दिन की दवा शेष थी। अगर बंदी के मारे पीछे से दवाओं की सप्लाई रुक गई तो मुसीबत हो जाएगी। मन बेचैन होने लगा, तो उन्होंने तत्काल बाजार जाने का निश्चय किया। हालाँकि अड़ोस-पड़ोस से पुलिस की सख्ती की तमाम बातें सुनने के बाद बाहर निकालने में कुछ धुकधुकी सी हो रही थी। यह आश्वस्ति तो थी कि दवा लाने के लिए निकलने की छूट है, मगर अखबार में पढ़ा था कि पुलिस द्वारा माँगे जाने पर डॉक्टर का लिखा प्रिस्क्रिप्शन दिखाना होगा। उन्होंने ढूँढ़-ढाँढ़कर कार्डियोलॉजिस्ट का पाँच साल पुराना परचा निकालकर जेब में रखा और स्कूटी बाहर निकाली।

मुख्य सड़क पर बाजार से पहले दो चौराहे पड़ते थे। दोनों पर पुलिस थी, मगर उन्हें किसी ने भी नहीं रोका, तो उनके मन में सोया हुआ आत्मविश्वास जाग उठा। दवा के अलावा सब्जी-फल वगैरह भी ले लूँगा, उन्होंने मन-ही-मन में सोचा। आज तो दवा के लिए जाने को मिल रहा है, कल पता नहीं निकलना हो पाए या नहीं!

निकले वह पिछले दिन भी थे, मगर तब तो बाजार गुलजार था। अखबार में यह खबर पढ़कर कि आटे, सरसों के तेल और शक्कर की कालाबाजारी शुरू हो गई है, लोग सुबह तीन घंटों के लिए खुली किराना की दुकानों पर टूट पड़े। अखबार में सही लिखा था, तेईस रुपए किलो वाला आटा चालीस रुपए में मिल रहा था। तेल पंद्रह रुपए और शक्कर पाँच रुपए ज्यादा पर मिल रहा था। लेना है तो लो, नहीं तो अपना रास्ता लो! गिरीश बाबू महीने भर का सामान जिस दुकान से लेते थे, उसने धीरे से कहा, “बाबूजी, सामान की लिस्ट दे जाइए। अभी भीड़ है, घंटे भर बाद ले जाइएगा।” बाद में जब उन्होंने सामान उठाया तो बिल देखकर खुशी हुई कि उसने आटा भले ही सात रुपए प्रति किलो ज्यादा लगाया हो, मगर तेल, चीनी और दालों के दाम ठीक लगाए थे। इस तरह वे लॉकडाउन के मैदान में अपनी पहली लड़ाई जीतकर प्रसन्न मन घर लौटे और पत्नी को सब हाल कह सुनाया। उसने प्रश्न किया, “चलो आज तो मिल गया, मगर यह बंदी लंबी चली, तो आगे जाने क्या हाल होगा?” और दोनों भविष्य की चिंता में वर्तमान की उपलब्धि को भुला बैठे।

गिरीश बाबू दो चौराहे तो ठाठ से पार कर आए, मगर बाजार में मुहाने पर पुलिस का बैरियर लगा देखकर उनका मुँह उतर गया। स्कूटी निकलने लायक जगह भी नहीं छोड़ी थी उन्होंने। सड़क किनारे की एक बंद दुकान के सामने कुरसियों पर तीन पुलिसवाले बैठे थे। उन्होंने स्कूटी खड़ी की और उनके पास जाकर विनम्रता से कहा, “मुझे अपनी दवा लेने मेडिकल स्टोर तक जाना है।” उनमें से एक ने कहा, “परचा लाए हैं?” उन्होंने जेब से निकालकर आगे बढ़ा दिया।  दरोगाजी ने बड़े गौर से प्रिस्क्रिप्शन पढ़ा और कुछ तीखे स्वर में कहा, “श्रीमानजी, यह तो पाँच साल पुराना परचा है। सीधे-सीधे कहिए न कि आपको बाजार जाना है, मगर अंदर एक भी दुकान खुली नहीं है। हाँ, आपको सचमुच दवा ही लेनी है तो अंदर चले जाइए, मेडिकल स्टोर खुला है।”

‘विनोद मेडिकल’ बाजार के बीचोबीच था। बाकी सारी दुकानों के शटर गिरे हुए थे। रोजाना फुटपाथ घेरकर खड़े होनेवाले ठेले और रेहड़ियाँ नदारद थीं। और तो और, सड़क पर मटरगश्ती और मस्ती करनेवाले साँड, गाएँ, कुत्ते और सूअरों का कहीं पता नहीं था। एक अनोखी बात यह थी कि पूरी सड़क साफ थी और जगह-जगह लगे कूड़े के ढेर भी गायब थे। लग रहा था, जैसे बाजार बंद करके झाड़-बुहारकर चमका दिया गया हो। मगर किसके लिए? वहाँ तो एक गहरा स्यापा जारी था।

मेडिकल स्टोर के सामने पहुँचकर कुछ प्राणी नजर आए, तो राहत सी महसूस हुई। वहाँ भी शटर आधा गिरा हुआ था और ज्यादातर ग्राहक बाहर लाइन में दूर-दूर खड़े थे। अंदर एक समय में एक ही व्यक्ति जाता था। वह भी लाइन में खड़े हो गए और अपनी बारी का इंतजार करने लगे। उन्होंने देखा कि लाइन में खड़े सभी लोगों ने अपने चेहरों पर मास्क लगा रखे थे। कुछ देर बाद बिना मास्क उन्हें अटपटा-सा लगने लगा। मगर क्या कर सकते थे! अंदर से जैसे ही कोई दवा लेकर निकलता, लाइन में आगेवाला व्यक्ति अंदर दाखिल हो जाता। उन्होंने गौर किया कि दवा लेने में औसतन एक आदमी को दस से बारह मिनट लग रहे थे। इस हिसाब से उन्हें कम-से-कम पौना घंटा तो लगना-ही-लगना था। जब सामने दो आदमी रह गए तो अंदर से एक सेल्समैन मास्क की गड्डी लेकर निकला और जोर से बोला, “बिना मास्कवाले को दवा नहीं मिलेगी। जिन-जिन को चाहिए, ले लें। चालीस-चालीस रुपए का है। तीन लेने पर सौ में मिल जाएँगे।” गिरीश बाबू ने सौ का नोट देकर तीन ले लिये।

राम-राम करके दवा मिली, मगर हमेशा मिलनेवाला टेन परसेंट डिस्काउंट नहीं मिला। वापसी में सब्जी से लदे हाथठेलों की एक लंबी कतार कॉलोनी की तरफ जाती दिखाई दी। शायद मंडी से माल लेकर लौट रहे थे। उन्हें याद आया कि अखबार में जहाँ किराना को सुबह तीन घंटे की छूट थी, वहीं दूध-ब्रेड-सब्जी की बिक्री पर पाबंदी नहीं थी। शर्त यही कि इसके लिए दुकान खोलने की अनुमति नहीं होगी। ठेलेवाले मास्क लगाकर गली-मोहल्लों में सब्जी बेच सकेंगे। उनका मकान कॉलोनी में सबसे पीछे था। वहाँ तक आते-आते सब्जी और फल छँट जाएँगे; बचा-खुचा मिलेगा। उन्होंने सोचा कि क्यों न किसी एक को रोककर अभी ही सब्जी ले ली जाए। संयोग से पंक्ति के अंतिम छोर पर एक लड़का था, जो उन्हें पहचानता था। उनके कहने से रुक तो गया, मगर बोला, “अगले चौराहे पर बाएँ मुड़कर आ जाइए, यहाँ रुकेंगे तो पुलिसवाला लाठी से मारेगा।” अगले चौराहे पर बाएँ मुड़कर कुछ दूर चलने पर सब्जीवाला मिल गया। सचमुच एकदम ताजा-ताजा सब्जियाँ थीं। वे बड़े उत्साह से भिंडी, तुरई, करेले, गोभी, टमाटर छाँट-छाँटकर थैले में डलवाते रहे, जब तक वह पूरी तरह न भर गया। सब्जीवाला हिसाब जोड़ रहा था कि छत पर लगे भोंपूवाली पुलिस की जीप सायरन बजाते हुए आई और जब तक वे सँभलें, सब्जीवाला ठेले सहित भाग खड़ा हुआ। जीप उनके पास से यह कहते हुए गुजरी, “जाइए, घर जाइए, बाहर निकलने पर मुश्किल में पड़ सकते हैं।” उन्होंने तुरंत स्कूटी स्टार्ट की और वापस चौराहे जा पहुँचे। यहाँ से सीधे घर का रास्ता पकड़ा।

जैसे ही अपने फाटक के सामने स्कूटी खड़ी की, माँ-बेटी दोनों बाहर निकल आईं। उनकी पत्नी बोली, “शुक्र है, आप सही-सलामत लौट आए। बगलवाले शुक्लाजी का बेटा अपने दोस्त के घर गया था, रास्ते में ही पकड़ लिया गया। उसे तो छोड़ दिया, मगर मोटरसाइकिल थाने में जमा कर ली गई। शुक्लाजी नेताइन को लेकर बाइक छुड़ाने गए हैं।”

गिरीश झल्लाकर बोले, “अरे भाई, मैं तो दवाइयाँ लेने गया था, मेडिकल स्टोर जाना अलाउड है। मैं कोई घूमने तो नहीं गया। फिर काहे को शोर मचाए हो?”

पत्नी मुँह बनाकर कहने लगी, “इनकी सुनो, कहते हैं कि दवा लेने गए थे, और सामने थैले में सब्जियाँ भरी हैं। पुलिसवालों के क्या आँखें नहीं हैं?”

बेटी शैल ने भी अपने दिल का गुबार निकाला, “पापा, दो दिन से बराबर टी.वी. पर कहा जा रहा है कि साठ से ऊपरवाले बुजुर्ग इमरजेंसी के अलावा घर से बाहर कतई न निकलें। खासतौर पर बी.पी. और डाइबिटीज के मरीज। आप तो यह भागा-दौड़ी रहने दो, हम लोग सब्जी-भाजी के बगैर काम चला लेंगे।”

गिरीश बाबू को मन-ही-मन बहुत कोफ्त हुई, ‘लो, इनके लिए तो किसी तरह से ताजा सब्जियाँ लेकर आया और यही आँखें दिखा रही हैं!’ बहरहाल, थैला उठाकर दोनों खाना बनाने किचन में चली गईं। वे अखबार लेकर तमाम निषेध और नकार तफसील से पढ़ने लगे। सुबह तो सरसरी तौर से नजर डाली थी। देश में क्या-क्या बंद रहेगा, इसकी सूची बहुत लंबी और त्रासद थी। ऐसा शायद ही किसी ने पहले कभी देखा या सुना हो। ट्रेनें, बसें और यहाँ तक कि टैक्सी और ऑटो तक बंद हो चुके थे। बाजार, दफ्तर, होटल-रेस्त्राँ, मॉल, सिनेमा, जिम और सैलून ही नहीं, मंदिर-मसजिद-गुरुद्वारे और चर्चों के दरवाजे भी उपासकों के लिए बंद हो चुके थे। अस्पतालों और नर्सिंग होम्स के ओ.पी.डी. तो बंद हुए ही, स्कूल-कॉलेज और सभी तरह के शिक्षण संस्थानों में अनिश्चित काल के लिए लॉकडाउन घोषित हो गया। चलती हुईं परीक्षाएँ अधबीच में रुक गईं। कुल मिलाकर यह एक कल्पनातीत स्थिति थी। पूरा विश्व एक भयावह और सर्वग्रासी महामारी की चपेट में आ चुका था और किसी को पता नहीं था कि आगे क्या होनेवाला है! बस, एक ही बात बार-बार दोहराई जा रही थी कि अभी तक यह मर्ज लाइलाज है। यह सब सोचते हुए उनका माथा घूमने लगा।

अखबार में किसी-किसी जगह लॉकडाउन की जगह कर्फ्यू शब्द का भी प्रयोग किया गया था। लॉकडाउन तो नहीं, मगर कर्फ्यू की कुछ डरावनी यादें उनके जेहन में थीं, जो मौका पाते ही उभरने लगीं। अपने बासठ साल के जीवन में उन्होंने तीन-चार कर्फ्यू झेले थे, जो कि सांप्रदायिक दंगों के कारण लगाए गए थे। उनमें सख्ती से सबकुछ बंद कर दिया जाता था। कई-कई दिन दूधवाली चाय पीने को तरस जाते थे। घर के दरवाजे से बाहर पैर रखना गुनाह था, जिसकी तत्काल सजा मिलती थी। गैस सिलेंडर खत्म हो जाए या किसी को दिल का दौरा पड़ जाए, तो गम खाने के अलावा कोई चारा नहीं था।

सब बंद-ही-बंद है या कुछ खुला भी है? यह सोचते ही उनकी नजर टी.वी. पर पड़ी। यही एक था, जो २४×७ खुला था। उन्होंने रिमोट उठाया और टी.वी. ऑन कर दिया। एंकर किसी बड़े डॉक्टर से कोविड-१९ के बारे में बात कर रही थी। उस समय डॉक्टर साहब बता रहे थे कि इस पेंडेमिक का सबसे खतरनाक दौर होता है कम्युनिटी-स्प्रेड। इस स्थिति में इसे रोकना बहुत कठिन हो जाता है। हम अभी इससे बहुत दूर हैं, मगर यह स्थिति बनाए रखने के लिए जरूरी है कि हम फुरती से कॉण्टेक्ट ट्रेसिंग करते रहें और इसकी चेन को यथासंभव शीघ्र तोड़ते जाएँ। एक पी.आर.एस.एच.एन. के उत्तर में बताया गया कि अगर संक्रमित व्यक्ति के पास बगैर मास्क नौ मिनट रहा जाए, तो वायरस ग्रहण करने की संभावना हो सकती है। अभी आगे की बात सुनते कि उनकी बेटी खाने के लिए बुलाने आ गई।

डाइनिंग टेबल का नजारा देखने लायक था। कई तरह की डिशेज सजी थीं। तिल और मूँगफली वाली कुरकुरी भिंडी, मलाई भरवाँ टिंडे, टमाटर का रायता, मटर पुलाव वगैरह। उन्होंने मुसकराते हुए पूछा, “आज कोई खास दिन है, मुझे तो याद नहीं आ रहा।”

“हाँ, बहुत खास दिन है। लॉकडाउन है और आप ताजा-बढ़िया सब्जियाँ ले आए हैं तो सेलिब्रेशन तो बनाता है। अब कल से जाने मिलें-न-मिलें!” पत्नी ने उनकी प्लेट में परोसते हुए कहा।

“हाँ पापा, आज आप एकदम फ्रेश धारीदार तुरई ले आए। मैंने उनके छिलकों से शामी कबाब बनाए हैं। खाकर बताइए कैसे बने हैं?” उन्होंने चम्मच उठाई और कबाब चखकर कहा, “लाजवाब, जरा सॉस की बोतल आगे बढ़ाओ।”

खाना खाकर कुछ देर तक टी.वी. देखा, जब नींद से पलकें भारी होने लगीं तो बेडरूम में जाकर सो गए।

शाम को सूरज ढलते ही चाय पीकर वे टहलने निकले। रोजाना की आदत थी। कॉलोनी की एक परिक्रमा कोई ढाई-एक किलोमीटर की होती थी। इसमें वे एक ब्रेक करके मुल्लाजी की दुकान में आराम से बैठकर एक सिगरेट पीते थे। घर में तो सिगरेट का नाम लेना भी पाप था। जब से उनको बी.पी. की शिकायत हुई, तब से उन्होंने कसम खाकर छोड़ी हुई थी। लेकिन मौका निकालकर एक-दो बार कश मार ही लेते थे। सिगरेट पीते हुए अकसर वे तत्कालीन गंभीर समस्या के बारे में मनोयोग से सोचा करते थे; और आज तो पेंडेमिक और लॉकडाउन जैसे मसले दरपेश थे।

मुल्लाजी के झोंपड़ीनुमा घर के बरामदे में ही साइकिल मरम्मत और पान की दुकान थी। उन्होंने पहुँचकर देखा कि बरामदे के आगे टाट का परदा लटक रहा था। वे निराश होकर लौटने लगे तो परदे के पीछे से आवाज आई, “सर, अंदर आ जाइए। आपके लिए तो सेवा अभी चालू है।” सिगरेट सुलगाकर पैसे दिए तो मुल्लाजी ने कहा, “सर, एक रुपया और दीजिए। अब ब्लैक में बहुत महँगी मिल रही है।”

अब दुकान में बैठने की सुविधा नहीं थी, तो बाहर पीपल के पेड़ के नीचे जा खड़े हुए और धुआँ उड़ाते हुए परिस्थिति पर गंभीरता से विचार करने लगे। सहसा समवेत स्वर के शोर से उनका ध्यान टूटा। पीपल के नीचे बने गोलाकार चबूतरे पर बैठनेवाला मोची नदारद था और कॉलोनी के पाँच-छह लड़के महफिल जमाए थे। एक लड़का कह रहा था, “अबे करोना से उतनी परेशानी नहीं है, जितनी सब दफ्तर बंद हो जाने से हुई है। अब हमारा बाप दिन भर घर में बने रहते हैं तो समझो जीना मुहाल है। पूरा घर परेशान है। सारे दिन हर बात पर टोका-टाकी। सबसे ज्यादा मुसीबत अम्मा की है, अगले का हुकुम बजाते-बजाते मार हलकान हुई रहती हैं। दीदी तो बेचारी सामने पड़ती ही नहीं। हर समय किताब लिये बैठी रहती हैं। लेकिन हमारी तरफ नजर नहीं डालते, मालूम है कि अपन उनको ठेंगे पर रखते हैं। और हमारा मार-कूट और गाली खाने का कोटा पूरा हो चुका है।”

“नहीं बे! असल बात ये है कि तुम लाते हो कमाकर, जबकि तुम्हारे साथ के सब लड़के टुल्लू बने घूम रहे हैं। इस अभिषेकवा को ही देखो, करते-धरते कुछ हैं नहीं, बस, पड़ोस में आँखें लड़ाया करते हैं। वह भी अभी टाइम पास कर रही है, मौका पाते ही झटक देगी। समझे!”

एक जोरदार ठहाका लगा। गिरीश बाबू भी मुसकराने लगे। तभी संभवत: अभिषेक ने प्रतिवाद किया, “अरे छोड़ो, अपन कच्‍ची गोलियाँ नहीं खेलते, रेखा इधर-उधर होनेवाली नहीं है। उसे मालूम है कि बाबू देर-सवेर मर्चेंट नेवी का कंपटीशन निकाल ले जाएँगे। असली लभेड़ तो हमारे बुढ़वों से है, दोनों को शक हो गया है। दिन-रात ताड़ते रहते हैं कि कहीं नैन-मटक्का न हो जाए! कसम से प्यार का लॉकडाउन हुआ पड़ा है।”

“अरे छोड़ो, ये साले बुड्ढे होते ही हरामी हैं। सौ-पचास का नोट निकालने में भी जान निकलती है इनकी। अरे, जब बेटों के शौक पूरे नहीं कर सकते, तो कमाते क्यों हो? और अभिषेक बाबू, अब लॉकडाउन भर तो सबर रखना ही पड़ेगा। इतनी फैसिलिटी क्या कम है कि मामला बस नेक्स्ट डोर का है। यहाँ तो दस किलोमीटर के चक्कर लगाते-लगाते पागल हो गए। हजारों का पेट्रोल फूँक दिया, सो अलग।”

लड़कों की उलटी-सीधी सुनते हुए गिरीश बाबू ने ईश्वर को हृदय से धन्यवाद दिया कि उनको शलभ जैसा सीधा, नेक और अनुशासित लड़का मिला। हमेशा पढ़ाई में अव्वल। इंजीनियरिंग पास करके अच्छी नौकरी में लगा है। यह भी अच्छा है कि बेंगलुरु में है, कॉलोनी के लड़कों की संगत से दूर। लड़की भी कम योग्य नहीं थी। फर्स्ट क्लास एम.एस-सी., बी.एड. करके कंपटीशन की तैयारी कर रही थी। उसके लिए वर ढूँढ़ने की जरूरत ही नहीं पड़ी। शलभ का एक क्लासमेट भुवन यहाँ एच.ए.एल. में मैनेजमेंट ट्रेनी होकर आया और ट्रेनिंग खत्म होते-होते उसने शैल को पसंद कर लिया। दोनों पक्ष मिले और बात पक्की हो गई। शलभ की उपलब्धता के अनुसार मई में सगाई का कार्यक्रम होना था। गिरीशजी दकियानूसी तो नहीं थे, मगर शादी के पहले लड़के-लड़की का ज्यादा मिलना-जुलना उन्हें सही नहीं लगता था, मगर उनकी पत्नी अकसर भुवन को चाय पर बुलातीं और फिर रात का खाना खिलाकर ही भेजतीं। उनका खयाल था कि शैल और भुवन की काफी बातचीत हुआ करती है। उनकी असहज मुद्रा को भाँपकर श्रीमती गिरीश ने यह तय कर दिया कि हर शनिवार की शाम भुवन उनके यहाँ ही भोजन करेंगे।

उनके मन में यही सोच-विचार चल रहा था कि टैंपो स्टैंड की तरफ से दो लड़के चिल्लाते हुए आए, “भागो, भागो, सिंघम आ रहा है। चौराहे पर लड़कों को खूब लठियाया है।”

सुनते ही पीपल के नीचे अड्डा जमाए लड़के सिर पर पैर रखकर भागे। जब तक वह कुछ समझ पाते, पुलिस की डायल-१०० जीप अजीब सी आवाज निकालती रोड से अंदर की ओर मुड़ी और उनके पास आकर रुकी। ड्राइवर की बगल में बड़ी-बड़ी मूँछोंवाला लगभग दैत्याकार एक वरदीधारी हाथ में बेंत लिये बैठा था। यही होगा सिंघम, उन्होंने अनुमान लगाया। अब गाड़ी उनके पास आकर रुकी थी तो पलायन करना मुश्किल था। सिंघम कुछ देर तक अपनी बड़ी-बड़ी आँखों से उन्हें घूरता रहा, फिर हाथ जोड़कर बोला, “मेहरबानी करके अपने घर जाइए! कहीं कोरोना ने पकड़ लिया तो जान के लाले पड़ जाएँगे। बुजुर्गों को ही सबसे ज्यादा खतरा है। अभी कुछ दिन घूमना-फिरना बंद रखिए! चलो भाई।” और एक झटके से जीप आगे बढ़ गई। उन्होंने घर जाने के लिए एक घुमाव-फिराव वाला अपेक्षाकृत सुरक्षित रास्ता पकड़ा। इसलिए कि सिंघम से दोबारा टकराने की नौबत न आए। यह रास्ता आदर्श नगर के भीतर से जाता था। चलो, ढाई के बजाय चार किलोमीटर सही। इस रास्ते पर चलते हुए सहसा घी में कुछ मसालेदार तले जाने की मोहक खुशबू आई। उन्हें याद आया कि यह बजरंग स्वीट हाउसवाले गुप्ताजी का घर है। दुकान तो खोल नहीं सकते, इसलिए घर में जरूर समोसे बन रहे होंगे। उनका अनुमान सही निकला। सामने पहुँचकर खुले दरवाजे से उन्होंने देखा कि बीच आँगन में गैस भट्ठी की ज्वाला लपलपा रही है और तख्त पर बैठा कारीगर कड़ाही में तले जा रहे समोसों को झारी से उलट-पलट रहा है। दो-तीन ग्राहक प्रतीक्षारत खड़े नजर आए, तो वे भी अंदर चले गए। वहाँ से निकले तो हाथ में समोसों से भरा डोंगा था।

सुबह की तरह ही विजेता की मुद्रा में वे घर में दाखिल हुए। लेकिन इस बार उन्हें डाँट नहीं पड़ी, बल्कि समोसे देखकर माँ-बेटी के चेहरे खिल गए। प्रेम से समोसे खाते हुए शैल ने माँ के कान में कुछ कहा, जिसे सुनकर उन्होंने सिर हिलाया और गिरीश बाबू से बहुत मीठे स्वर में कहा, “यह तो बड़ा अच्छा हुआ कि लॉकडाउन में भी समोसे मिलने का ठिकाना आपने ढूँढ़ निकाला। देखना, अब उसके घर में रोज समोसे-खस्ते बनेंगे। सुनो, कल कुँवर साहब आएँगे तो आप पहले ही जाकर ले आना, उन्हें गुप्ता के समोसे बहुत पसंद हैं।”

उसके बाद चाय का दौर चला। उस दौरान श्रीमती गिरीश ने कहा, “आप बाजार जाने से पहले मुझसे और शैल से पूछ तो लेते। बहुत से जरूरी आइटम रह गए। शैंपू एकदम खत्म है, पीयर्स सोप नहीं है, वॉशिंग मशीन का पाउडर भी चाहिए था। इसको कल सुबह-सुबह ही बाल धोने होंगे। कल शनिवार है न, बताओ बगैर शैंपू कैसे धोएगी?” उन्होंने आश्वस्त किया कि सुबह जल्दी जाकर ले आएँगे।

शैल कुछ सकुचाते हुए बोली, “मम्मी, हमें पार्लर भी जाना था। पता नहीं खुलेंगे भी या नहीं?” गिरीश बाबू मंद-मंद मुसकराते हुए बोले, “नहीं बेटे, सैलून, ब्यूटी पार्लर, जिम सब बंद रहेंगे।”

“कोई बात नहीं, हम भटनागर आंटी से करवा लेंगे, वह घर में करती हैं।” बेटी ने कहा तो गिरीश को उस दिन की याद आ गई, जब वह लड़की देखने गए थे। उन दिनों कहाँ होते थे ब्यूटी पार्लर! बड़ी बहन या सहेलियाँ अच्छे से सजा देती थीं।

वे उठकर टी.वी. देखने ड्राॅइंग रूम जाने लगे तो उनकी पत्नी ने कहा, “देखो, सुबह मैं कहीं भूल न जाऊँ, इसलिए अभी बता रही हूँ, बाजार जाओ तो याद करके कल शाम के लिए पनीर और कुछ ड्राइ फ्रूट्स जरूर लेते आना।”

सुबह जल्दी उठकर उन्होंने नहाना-धोना, पूजा-पाठ निपटाया, चाय पीते हुए अखबार की सुर्खियों पर नजर डाली और बाजार का काम निपटाने को तैयार हो गए। पत्नी से पूछकर सब आइटम्स की लिस्ट बनाई और स्कूटी स्टार्ट करके रवाना हुए। जैसे ही ब्लॉक की सड़क पार करके मेन रोड के मुहाने के नजदीक पहुँचे, एक झटके से उनकी स्कूटी रुक गई। आगे रास्ता बंद था।

उन्होंने हैरानी से देखा कि उनके घर से मेन रोड आनेवाली सड़क महानगर पुलिस के दो रोड ब्लॉक लगाकर बंद कर दी गई थी। उस पार किसी पासवाले घर से माँगी गई प्लास्टिक की कुरसियों पर पुलिस के दो जवान बैठे थे और एक होमगार्ड खड़ा था।

स्कूटी खड़ी करके वे रोड ब्लॉक तक गए। पूछने पर पुलिसवालों ने बताया कि पिछली रात को इसी ब्लॉक में आगे कोरोना का एक केस निकल आया है। उसे अस्पताल ले गए हैं और बीमारी को फैलने से रोकने के लिए इस सड़क को दोनों छोर से बंद कर दिया गया है। अब चौदह दिन तक इस गली के सभी लोगों का आना-जाना पूरी तरह बंद रहेगा। उन्होंने जरूरी चीजें खरीदने के लिए बाजार जाने की जरूरत बताई, तो टके-सा जवाब मिला, “बाबूजी, अब दो हफ्ते तो बाहर निकलने की सोचिए भी मत। जल्द ही होम डिलिवरी सेवा शुरू हो जाएगी, बस, तब तक काम चला लीजिए। अगर आपको दूध, ब्रेड या दवा चाहिए तो एक परचे पर अपने फोन नंबर सहित लिखकर पैसों के साथ इस होमगार्ड को दे दीजिए। सामान आते ही आपको फोन करके बुला लेंगे।”

लौटते हुए उन्होंने देखा कि गली में सन्नाटा पसरा था। कुछ लोग ऊपर छतों से जरूर झाँक रहे थे।

घर पहुँचकर जब उन्होंने यह सब बताया तो माँ-बेटी दोनों के मुँह से निकला, “हाय राम, अब क्या होगा? कमबख्त कोरोना को कोई और ठौर नहीं मिली, जो हमारे ही मोहल्ले में आ धमका। अब रहना होगा दो हफ्तों तक घर में कैद।”

गिरीश बाबू निराश दिखाई दिए तो पत्नी ने सुर बदला, “अरे, आप किस सोच में पड़ गए, एक हम ही तो नहीं, पूरा ब्लॉक ही झेलेगा। पता नहीं किसके घर में निकला है। थोड़ी देर में पता करते हैं। मुन्नी, जरा शुक्लाइन आंटी को फोन लगा। उनसे पता चल जाएगा। उन्हें सारी खबर रहती है।”

पता चला कि भटनागरजी का लड़का दो दिन पहले ही नोएडा से आया था, उसी को निकला है कोरोना। रात में लेकर गई है सरकारी एंबुलेंस। आज पूरे परिवार का टेस्ट होगा, तब पता चलेगा कि किस-किस को और है। मोहल्ले-पड़ोस में भी लोगों से पूछा जाएगा कि पिछले दिनों कौन-कौन गया था उनके यहाँ। अरे, यह तो भगवान् ने बचाया हम लोगों को, नहीं तो शैल जानेवाली थी उनके यहाँ फेशियल करवाने। सोचो, तब कैसी मुसीबत आती!

गिरीश बाबू ने भारी मन से खाली थैले पत्नी को पकड़ाते हुए कहा, “मैं समझता हूँ, हमें भुवन को खबर कर देनी चाहिए। एक तो वैसे ही रास्ता बंद है, दूसरे बहुत बड़ा रिस्क है।”

पत्नी मुँह बनाकर बोलीं, “आप भी न, कैसी बातें करते हैं! ऐसे आने को माना किया जाता है क्या? और कौन सा यहाँ निकला है, पाँच घर छोड़कर हुआ है, वह भी बाहर से आए लड़के को। वहीं से लेकर आया होगा। इस गली का रहनेवाला होता तो हम मानते।”

लेकिन शैल ने प्रतिवाद किया, “मम्मी, पापा ठीक कह रहे हैं। हमें उन्हें बता देना चाहिए। मैं अभी फोन करके आती हूँ”, कहकर वह दूसरे कमरे में चली गई। पति-पत्नी ने अर्थपूर्ण दृष्टि से एक-दूसरे को देखा और बैठ गए। गिरीशजी ने कहा, “मुझे तो चिंता हो रही है। भुवनेश बाबू फैक्टरी में काम करते हैं, वहाँ हर समय दूरी बनाकर रखना मुमकिन नहीं है। सैकड़ों-हजारों में कौन वायरस ले आए, क्या पता चलता है!”

पत्नी ने कहा, “शुभ-शुभ बोलिए। मुझे पूरा विश्वास है कि उनका बाल भी बाँका नहीं होगा। वे तो खुद इतने समझदार हैं कि इस आफत से बचकर ही रहेंगे। अपना शैलेश भी तो इतनी बड़ी कंपनी में काम कर रहा है, लेकिन ये सब पढ़े-लिखे लड़के हैं। इन्हें अपना दामन बचाना खूब आता है।”

वे कुछ बोलते कि शैल फोन कान पर लगाए हुए आई और धीरे से बोली, “पापा, जरा वह सामान की लिस्ट पकड़ाइए तो!” उन्होंने जेब से लिस्ट निकालकर दे दी। वह फिर दूसरे कमरे में चली गई।

“अब यह खामख्वाह बेचारे कुँवर साहब को परेशान करेगी। ऐसा कौन सा जरूरी समान है, जिसके बिना काम नहीं चल सकता?”

लौटकर शैल ने सिर्फ इतना कहा, “मम्मी, उनके घर के पास ही एक जनरल स्टोर है, आते समय वहाँ से लेते आएँगे।”

मम्मी ने जवाब दिया, “तो ऐसा करें कि पहले घर की साफ-सफाई कर डालें। बाद में खाना बनाएँगे।”

दो ब्लॉकों के बीच में जगह कुछ ज्यादा छोड़ी गई थी। इसे परली तरफ जाने के लिए बतौर शॉर्टकट इस्तेमाल किया जाता था। वे उसी से होते हुए एक दूसरी सड़क पर निकल गए। वहाँ नाकाबंदी नहीं थी। आराम से टहलते हुए आदर्श नगर में गुप्ता के मकान तक पहुँच गए। समोसे लेकर अपनी गली में चोर की तरह छुपते-छुपाते दाखिल हुए तो दिल जोरों से धड़क रहा था, मगर सुरक्षित घर पहुँच गए। वहाँ रात्रिभोज की तैयारी जोर-शोर से चल रही थी।

समय गुजरता गया, यहाँ तक कि चाय का समय निकल गया। समोसे ठंडे होते रहे, मगर भुवन नहीं पहुँचे। चिंतित होकर गिरीश बाबू बोले, “कहीं ऐसा तो नहीं कि वो आए हों और पुलिसवालों ने लौटा दिया हो! लेकिन ऐसा होता तो वह फोन करके बताते। मुन्नी, तुम्हीं फोन लगाकर पता करो।”

तभी बाहर से किसी ने जोर से आवाज लगाई, “गिरीश चंद्र शर्माजी बाहर आइए!”

वे घबराकर पत्नी की ओर देखकर बोले, “यह कौन हो सकता है?”

“अरे, बाहर जाकर देखिए न, इतना घबरा क्यों रहे हैं?” और तीनों एक साथ बाहर निकल आए।

गिरीश बाबू ने फाटक पर खड़े होमगार्ड को पहचान लिया और उसके पास जाकर पूछा, “क्या बात है, भैया?”

उसने एक कैरी बैग आगे बढ़ाते हुए कहा, “नमस्ते बाबूजी, अभी एक साहब कार से आए थे। आपके लिए यह सामान दे गए हैं। लीजिए।”

“अरे भाई, वह हमारे दामाद हैं। उन्हें थोड़ी देर के लिए अंदर आ जाने देते।”

“मजबूरी है साहब, नहीं तो हम क्यों किसी को रोकते! आपसे क्या बताएँ कि कितनी सख्ती है। फिर वह कार में थे, उन्हें भेजने के लिए बैरियर हटाने पड़ते। रिपोर्ट या चेकिंग हो जाती, तो तीनों का सस्पेंशन पक्का था।”

वे कैरी बैग लेकर बरामदे तक पहुँचे तो उनकी पत्नी ने मुँह पर आँचल रखते हुए कहा, “देखा, कितने अच्छे हैं मुन्नी के होनेवाले दूल्हा। कर्फ्यू लगा है, मगर इसके लिए शैंपू और सोप पहुँचाकर ही गए”।

शैल चिढ़कर बोली, “अब क्या करेंगे इस शैंपू का? चौदह दिन तो न हम कहीं जा सकते, न कोई हमारे यहाँ आ पाएगा।”

तीनों अंदर पहुँचे तो शैल के फोन की घंटी बजे जा रही थी। सबके मुँह से एक साथ निकला, “उन्हीं का होगा।”

३७४ ए-२, तिवारीपुर

जे.के. रेयान गेट नं.-२ के सामने, जाजमऊ

कानपुर-२०८०१० (उ.प्र.)

दूरभाष : ९९३५२६६६९३
राजेंद्र राव

हमारे संकलन