कोरोना पर पाँच लघुकथाएँ

कोरोना पर पाँच लघुकथाएँ

फर्ज-१

कोरोना वायरस के कारण चिकित्सकों के लिए कई बाध्यताएँ लागू हो गईं। जो चिकित्सक अस्पताल में कोरोना मरीजों का उपचार कर रहे थे, उन्हें एक होटल में ही रहना पड़ रहा था।

उस दिन डॉ. रोहन की नौ वर्ष की बेटी का जन्मदिन था। घर पर जाना तो संभव नहीं था, पर बिटिया ने जिद कर ली कि पापा नहीं आएँगे तो वह बर्थडे नहीं मनाएगी। बेटी का मन रखने के लिए डॉ. रोहन किसी तरह समय निकालकर देर शाम घर पहुँचे, लेकिन घर के भीतर जा नहीं सकते थे।

घर में बिटिया केक काटकर अपना जन्मदिन मना रही थी और वे दरवाजे के सामने खड़े होकर बाहर से ही उसे देखकर खुश होते रहे।

फर्ज-२

कोरोना महामारी के कारण देश भर में लाॅकडाउन लग गया। कानून और व्यवस्था की जिम्मेदारी सदैव की भाँति पुलिस पर आ गई। सभी की छु‌ट्टियाँ रद्द कर दी गईं, किसी को घर जाने की अनुमति नहीं थी। बड़ी संख्या में पुलिसवाले गलियों और चौराहों पर तैनात हो गए, ताकि लोग घरों से बाहर न निकलें और महामारी से सुरक्षित रहें।

सिपाही बलदेव की ड्‍यूटी नगर के प्रमुख बाजार में लगी थी। तीन दिन से घर पर बात नहीं कर पाया था, इसलिए वहीं से घर पर फोन लगाया। पत्नी से बात हुई, माता-पिता का हाल पूछा, इतने में पाँच वर्ष का बेटा आ गया। कहने लगा, “पापा, घर कब आओगे?”

बलदेव क्या जवाब देता, टाल गया, “जल्दी ही आऊँगा, बेटा।”

बेटे ने अनुनय की, “अभी आ जाओ ना पापा, मम्मी ने आज छोले-भठूरे बनाए हैं, सूजी का हलवा भी...।”

पत्नी के हाथ के खाने का स्वाद याद कर बलदेव के मुँह में पानी आ गया। तभी साथी ने पुकारा, “अरे बलदेव! जल्दी आ जा, खाने का पैकेट आ गया है।” और बलदेव वहीं सड़क किनारे बैठकर अखबार में लिपटी चपाती और आलू की सब्जी खाने लगा।

फर्ज-३

शहर में कोरोना संक्रमण बुरी तरह फैल रहा था। लाॅकडाउन के कारण दिहाड़ी मजदूरों को काम मिलना बंद हो गया। कोरोना के डर ने उन्हें पलायन के लिए विवश कर दिया। बड़ी संख्या में मजदूर अपने घरों की ओर पैदल ही निकल पड़े। पुलिस ने रोक लिया और रैनबसेरे में ले जाकर ठहरा दिया।

सभी का कोरोना टेस्ट हुआ, कई मजदूर पॉजीटिव पाए गए, उन्हें तुरंत अस्पताल में भरती कराया गया। कोरोना के डर से रैनबसेरे में ठहरे सभी मजदूर भयभीत थे।

उस रैनबसेरे में सफाई का काम करता था रमजू। वह वहीं रहता और सुबह-शाम सफाई किया करता था। एक प्रौढ़ मजदूर ने उससे पूछा, “क्यों रे, इहाँ इत्ते बड़े रैनबसेरे की सफाई खातिर तू अकेला ही है कै?”

रमजू ने बताया, “हैं तो और भी, पर अभी बीमारी के डर से सभी काम छोड़ गए हैं।”

“तो क्या तुझे डर ना लगै इस मुए कोरूना से? भई हमकू तो भोत डर लगै है।”

मजदूर की बात सुन रमजू बोला, “डर तो हमको भी बहुत लगता है, घरवाले भी मना करते हैं, पर...।”

“पर पैसान की खातिर काम करत रही, है ना?” दूसरे मजदूर ने कहा तो रमजू एक क्षण चुप रह गया, फिर बोला, “तनख्वाह के लिए तो सभी करते हैं बाबू, पर इस वक्त सफाई की जरूरत ज्यादा है और यही हमारा फर्ज भी है।” और रमजू फिर से सफाई में जुट गया।

डर

परिजन एक वृद्ध को लेकर अस्पताल पहुँचे। बताया कि कई दिन से बुखार है और आज साँस लेने में भी कठिनाई हो रही है। उसे कोरोना होने की संभावना को देखते हुए चिकित्सकों ने तुरंत आइसोलेशन वार्ड में भरती कर उपचार आरंभ कर दिया। कोरोना टेस्ट हेतु सैंपल भी लिया गया। डरे हुए सभी परिजन वापस लौट गए। वैसे भी आइसोलेशन वार्ड में रुकने की अनुमति किसी को नहीं थी।

दूसरे दिन वृद्ध की स्थिति में कुछ सुधार दिखा। रिपोर्ट भी आ गई। रिपोर्ट में वह वृद्ध कोरोना नेगेटिव पाया गया। ऐसे में उन्हें वापस घर भेजने की काररवाई आरंभ हुई। चिकित्सकों ने फॉर्म पर दिए गए, नंबर पर परिजनों को फोन करने का प्रयत्न किया, लेकिन गलत नंबर होने के कारण नहीं लगा। कुछ कार्मिकों को बताए गए पते पर भेजा गया तो वह पता भी फर्जी निकला।

कोरोना के डर ने रिश्तों को कमजोर कर दिया था।

आँसू

कोरोना महामारी के कहर ने लोगों का जीवन दुष्कर बना दिया। व्यवसाय-नौकरी-धंधे सब बंद हो गए। ऐसे में सबसे बुरी स्थिति दिहाड़ी मजदूरों की हो गई। उनके लिए कहीं कोई काम नहीं था।

गोमती लोगों के यहाँ कपड़े धोकर अपना और दो छोटे बच्‍चों का गुजारा किया करती थी। उसका पति मकान बनानेवाला कारीगर था, जो एक वर्ष पूर्व निर्माणाधीन पाँच मंजिला भवन से गिरकर मर गया था।

कोरोना संक्रमण के डर से लोगों ने काम करनेवाली औरतों को घरों में बुलाना बंद कर दिया था। गोमती की आय बंद हो गई। घर में खाने को दाना नहीं बचा। बच्‍चे खाने की जिद करते तो चूल्हा जलाकर हाँडी में कुछ पत्थर डालकर उबालने को चढ़ा देती और कहती, “बच्‍चो, अभी तुम सो जाओ, जब खाना पक जाएगा तो तुम्हें उठाकर खिला दूँगी।” ऐसे बहाना करके रोज सुला देती।

एक दिन छोटे बेटा रात को नींद से जाग गया। देखा कि माँ और बड़ी बहन सो रही हैं। चूल्हे पर हाँड़ी वैसी ही चढ़ी हुई है। बच्‍चे ने हाँड़ी को खोलकर देखा तो पत्थर मिले। यह देख वह रोने लगा। गोमती जाग गई, बेटे के पास आई तो वह रोते हुए बोला, “तुम झूठ कहती हो माँ, हाँड़ी में तो पत्थर हैं, खाना कहाँ है? माँ, मुझे भूख लगी है।” गोमती कुछ न कह पाई, बस उसे अपनी गोद से चिपटा लिया और थपकी देकर सुलाने लगी। कुछ देर में बच्‍चे की सिसकियाँ तो कम होने लगीं, पर गोमती की आँखों से आँसू झर-झर बहते रहे।

 

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