स्त्रियों की बदलती स्थिति

स्त्रियों की बदलती स्थिति

इतने लंबे अरसे के साहित्यिक जीवन में स्त्रियों की समस्याओं के बारे में क्या सोचा?

मेरे इस प्रश्न को सुनकर महादेवीजी एक क्षण के लिए एकदम खामोश हो गईं और उनके चेहरे से स्पष्ट रूप से एक दुःखी भाव झलकने लगा। बोलीं, “क्या करें भाई, हमने तो हमेशा नारी जागरण की बात सोची है, बापू भी मानते थे कि यदि महिलाएँ मेरे साथ स्वतंत्रता आंदोलन में सम्मिलित नहीं होतीं, तो देश को अभी अगले सौ वर्षों तक स्वतंत्रता प्राप्त नहीं होगी। यही कारण था कि परदे में रहनेवाली तमाम औरतें गांधीजी के आह्व‍ान पर बाहर आईं, और इस स्वतंत्रता आंदोलन में भाग लिया।

“एम.ए. पास करने के बाद मुझे विदेश जाने की छात्रवृत्ति मिली थी। और मैं बापू से यह पूछने गई कि जाऊँ या न जाऊँ। गांधीजी ने कहा, ‘हमारी लड़ाई चल रही है और तू बाहर जाएगी?’ उन्होंने कहा, ‘अपनी मात्र भाषा के माध्यम से अपनी गरीब बहनों को शिक्षा दो।’ बापू के आदेश का पालन करते हुए एक पेड़ के नीचे कुछ बालिकाओं को एकत्र कर उन्हें पढ़ाना शुरू किया, तब कोई भी साधन नहीं था। बाद में विद्यापीठ का निर्माण हुआ और नारी शिक्षा में उसका कितना बड़ा योगदान रहा है। यह बात किसी से छिपी नहीं है। विदुषी विद्याविनोदनी, सरस्वती भर्ती, आदि उसकी परीक्षाएँ थीं, जिन्हें पास कर आज भी देश के कोने-कोने में नौकरी करती हुई महिलाएँ मिलती हैं। लड़कियों के पाठ्‍यक्रम में गृह विज्ञान की पढ़ाई, जिसमें गृहस्थ जीवन-संबंधी तमाम बातों को सिखाया जाता था। सबसे पहले विद्यापीठ के ही पाठ्‍यक्रम में हमने शुरू की थी, बाद में जिसका अनुसरण अन्यत्र हुआ। इसी प्रकार भाई सीताराम सेकसरिया, जो कि नारी जागरण के लिए जीवनपर्यंत प्रयत्नशील रहे और उन्होंने महिलाओं के विकास के लिए कलकत्ते में ‘श्रीशिक्षायतन’ नामक एक बहुत बड़ा शिक्षा संस्थान खोला, जो आज भी अपनी पूरी गरिमा के साथ चल रहा है। इसी प्रकार प्रसूत गृह के रूप में श्री सदन नामक संस्था भी उन्होंने खोली थी। शृंखला की कड़ियाँ, जो कि सन् ’४२ में प्रकाशित हुई, में भी मैंने नारी विषयक समस्याओं को लेकर ही लेख लिखे थे। ‘चाँद’ पत्रिका के संपादन काल में भी संपादकीय लेखों में मैं निरंतर नारी जागरण, उत्थान, उसकी समस्याओं, समाधान के बारे में लिखती रही हूँ। कहने का तात्पर्य यह है कि नारी जीवन को लेकर मैं प्रारंभ से ही चिंतित रही हूँ और आज भी अपने जीवन की इस सांध्य वेला में भी आश्वस्त नहीं हो सकी हूँ।”

भारतीय नारी मुक्ति आंदोलन के संदर्भ में आपके क्या विचार हैं?

महादेवीजी इतनी बात कहने के बाद भी सहज नहीं हो पाई थीं कि मेरे इस प्रश्न ने उन्हें जैसे बहुत दूर अतीत में लौटा दिया और बहुत ही गंभीर होकर बोलीं कि भाई, अब तो आंदोलनों का ही युग आ गया है। फैशन की तरह अब हमने बाल वर्ष, महिला वर्ष, विकलांग वर्ष, युवा वर्ष आदि मनाने शुरू कर दिए हैं और ये सारे आंदोलन अखबार, रेडियो, टी.वी. आदि के प्रचार रूप में ही होकर समाप्त ही जाते हैं। नारी मुक्ति आंदोलन विशेष रूप महिला दशक, जो कि समाप्त भी ही गया, लेकिन उसके अंतर्गत कोई उपलब्धि मुझे नहीं दिखी। ऐसा नहीं लगा कि इस महिला दशक के पूर्व की महिला और दशक के बाद की महिला में कोई विशेष अंतर आया हो। नारी-मुक्ति के आंदोलन का नारा अवश्य खूब प्रचारित हुआ, किंतु मुझे ऐसा लगता है कि स्वतंत्रता से पहले नारी जागरण के क्षेत्र में हम लोग अधिक मुक्त थे।

तब के नारी-मुक्ति आंदोलन और मौजूदा मुक्त नारी आंदोलन में जो बुनियादी अंतर आया हो, कृपया उसे बताने का कष्ट करें।

मुझे ऐसा लगता है कि तब हम लोगों की मुक्ति का आंदोलन भीतर से था और आज नारी ऊपर से मुक्त होना चाहती है। दरजी के सिले हुए कपड़ों की भाँति नारी-आंदोलन भी फैशन की वस्तु हो गया है और उसी में वह अपने को मुक्त मानती है। पहले जब हम लोग शराब की दुकानों में जाकर धरना (picketing) करते थे तो अच्छे-अच्छे पीनेवालों के होश भी गायब हो जाते थे। और आज की लड़की ऐसी वेशभूषा पहनकर, बन-ठनकर चलती है कि बिना पीए हुए लोगों को भी नशा आ जाता है, मानो मानसिक रूप से उसे मुक्ति नहीं मिली।

शिक्षा के क्षेत्र में स्त्रियों का क्या दायित्व रहा? समाज और सरकार ने किस हद तक प्रोत्साहित किया है?

चूँकि हमारी पूरी शिक्षानीति ही अंग्रेजों की बनाई हुई शिक्षा-पद्धति पर ही चल रही है, अतः महिलाओं के लिए कुछ विशेष होने की बात क्या कही जाए। स्वतंत्र होने के बाद हमें अपनी भाषा, संस्कृति, कला, मूल्य, दर्शन आदि को विशेष महत्त्व देते हुए शिक्षा-पद्धति बनानी चाहिए थी, किंतु दुर्भाग्य से ऐसा नहीं हो सका। मैं इसके लिए बार-बार अधिकारियों से लड़ती रही हूँ, किंतु उन लोगों ने कुछ भी ध्यान नहीं दिया। परिणामतः आज जैसी मूल्यहीन शिक्षा है, उसी का परिणाम है कि आज के युवक-युवतियों में कोई आस्था, विश्वास, नैतिकता, धर्म के दर्शन ही नहीं मिलते। स्वतंत्रता-प्राप्ति के इतने दिनों बाद भी अभी तक हम अपनी भाषा की समस्या को भी नहीं सुलझा सके, इससे बड़ी दुर्भाग्य की बात और क्या होगी कि राष्ट्र के पास वाणी ही नहीं है, अर्थात् राष्ट्र गूँगा है। अभी तक हिंदी के विरोध में अंग्रेजी थी और अब तो शासन ने उर्दू को भी उसके समकक्ष लाकर एक नई समस्या पैदा कर दी। चूँकि हमारे यहाँ इस प्रकार की कोई सामाजिक जागृति चेतना है ही नहीं, अतः सरकार जो भी करती है, उसका विरोध जिस व्यापक धरातल पर होना चाहिए, वह नहीं हो पाता। अतः समाज की ओर से बहुत कुछ होने की संभावना नहीं है और सरकार करना ही नहीं चाहती।

मेरा यह मानना है कि शिक्षा के क्षेत्र में वैसा कुछ नहीं हुआ, जो किसी भी स्वतंत्र देश की शिक्षा के लिए होना चाहिए। अब सुन रही हूँ कि कुछ नई शिक्षा नीति सरकार ने बनाई है, लेकिन अभी तक उसका पूरा स्वरूप में समझ नहीं सकी। इसी बीच कुछ महिलाएँ निश्चित रूप से विभिन्न क्षत्रों में अपनी पूरी प्रतिभा के साथ आई हैं और विभिन्न क्षेत्रों में कार्य भी किया है, और पुरुषों से अच्छा कार्य किया है। लेकिन ऐसा नहीं है कि उन्हें कोई विशेष शिक्षा दी गई हो। हमारे यहाँ प्राचीन काल में मातृसत्तात्मक परंपरा रही है, इसीलिए वंशकुल भी माता के नाम से चलते थे, जैसे कुंती से कौंतेय, मैत्री से मैत्रेय, गार्गी से गार्गेय आदि उस युग की अनेक महिलाओं के नाम गिनाए जा सकते हैं, जो हर क्षेत्र में पुरुष के समकक्ष थीं। बाद में धीरे-धीरे हमारे यहाँ पुरुष सत्तात्मक व्यवस्था हुई और नारीशक्ति कमजोर हुई, जो कि आज तक है। और जैसी स्थितियाँ हैं, उससे अभी कोई सुधार होने की आशा नहीं लग रही है।

पिछले कुछ वर्षों से दहेज को लेकर न जाने कितनी महिलाओं की हत्या हुई है। पुरुष जाति की इस नृशंसता के बारे में आपका क्या कहना है?

मेरे इस प्रश्न को सुनकर महादेवीजी उत्तेजित सी हो गईं और साफ दिखाई दे रहा था कि दहेज को लेकर महिलाओं की हत्या के लिए उनके मन में कितना क्रोध है। थोड़ी देर रुककर सामान्य होने की चेष्टा करते हुए बोलीं, “मुझे ऐसा लगता है कि दहेज के पीछे हो रही हत्याओं में केवल पुरुष ही नहीं, महिलाओं का भी हाथ होता है। क्योंकि प्रायः सुनने में आता है कि कभी लड़के की माँ, कभी बहन भी उसमें सम्मिलित रहती हैं। फिर भी सबसे अधिक दोषी मैं उस लड़के को ही मानती हूँ, जो अग्नि को साक्षी बनाकर हर प्रकार से पत्नी की सुरक्षा करने का वचन देकर ले आता है और फिर उसकी रक्षा नहीं करता। परिवार के अन्य लोगों के संबंध उस लड़की से वैसे नहीं हो सकते, जिस भावनात्मक स्तर पर पति का होता है। कभी-कभी तो लगता है कि आज समाज अर्थ पिशाच हो गया है, उसे मात्र पैसा चाहिए। सुनने में तो यहाँ तक आता है कि कुछ लोगों ने ब्याह को व्यापार बना लिया है। एक ब्याह हुआ, लाखों दहेज लिया और फिर पत्नी को मार डाला और दूसरा ब्याह किया। इस प्रकार कुछ लोगों ने चार-चार ब्याह किए हैं। (महादेवीजी जब यह बात कह रही थीं तो उनके चेहरे से कुछ इस प्रकार के भाव उभरकर आ रहे थे कि जैसे ऐसे व्यक्तियों को समाज द्वारा ऐसी सजा मिलनी चाहिए कि दूसरा व्यक्ति ऐसी नृशंसता का कभी साहस ही न कर सके।) विचित्र समाज में हम लोग जी रहे हैं। मैं तो लड़कियों से कहती हूँ कि नीलामी पर चढ़े लड़कों के साथ, जिनकी बोलियाँ चीजों की तरह लग रही हैं, तुम लोग शादी मत करो।

लड़कियों में इस तरह की जागृति आनी बहुत ही आवश्यक है, तभी कुछ हो सकता है। शुरू में कुछ कठिनाइयाँ आएँगी अवश्य, किंतु धीरे-धीरे उनका भी संगठन इतना समर्थ हो जाएगा कि ऐसी समस्याएँ समाप्त हो जाएँगी। हमारे यहाँ पढ़ी-लिखी लड़कियाँ भी दया की पात्र बनकर रह जाती हैं। मैं तो कहती हूँ कि अन्याय का प्रतिकार करो और अपने में वह शक्ति, ऐसी ज्वाला लाओ, ताकि पुरुष की नृशंसता को भस्म कर सको। हमारे यहाँ नारी शक्ति की महिमा अद्भुत थी, यही कारण है कि विद्या की अधिष्ठात्री सरस्वती हुईं, धन की लक्ष्मी और शक्ति की सिंहवाहिनी दुर्गा। इस प्रकार विद्या, बुद्धि, धन, वैभव, ओज शक्ति सभी रूपों में नारी को स्थान मिला। आज समय आ गया है, जब उसे पुनः अपनी शक्ति को जगाना है और अपने को स्थापित करना है।

महिला समाज के भविष्य के बारे में आपका क्या कहना है?

मेरे इस प्रश्न को सुनकर महादेवीजी थोड़ी उत्साहित होती हुई बोलीं कि हम निराशावादी व्यक्ति नहीं हैं। स्थितियाँ इस समय अनुकूल नहीं हैं, फिर भी हमारा दृढ़ विश्वास है कि एक-न-एक दिन अवश्य ऐसा आएगा, जब नारी स्वतः अपनी शक्ति को पहचान सकेगी और तब पुरुष वर्ग द्वारा भी उसे पूर्णरूपेण सम्मान प्राप्त होगा। धीरे-धीरे महिलाएँ हर क्षेत्र में प्रवेश कर रही हैं और कई स्थानों पर तो पुरुषों से अच्छा कार्य कर रही हैं।

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—आरती मालवीय

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