खिड़की

खिड़की

अपने पति रोहित और उसके बीच बात को तो वहीं खत्म कर दिया सुधा ने...लेकिन उथल-पुथल उसके भीतर दूर तक चलती गई, चलती रही। कहाँ तक जाएगी वह इस रास्ते? उसकी अपनी पारिवारिक सीमाओं और जनार्दन बाबू की अपनी प्रतिष्ठागत सीमाओं की वजह से अगर वह जनार्दन बाबू के साथ स्थायी रूप से रहने से बची रही तो भी बीच कहीं कितनी ऐसी, मिलती-जुलती परिस्थितियाँ हो सकती हैं—अभी वह दिन-दिन में ही वहाँ होती है, कभी अँधेरे तक रुकना पड़ा तो, रात को जाना पड़ा तो...? वे कभी बीमार हुए तो क्या रात को भी उनके यहाँ रुक जाएगी वह? जनार्दन बाबू का कोई भी कहना नहीं टाल पाती...अगर उन्होंने ही कहा...

मना कर सकती है क्या वह उन्हें?

रिनोवेशन का काम खत्म हुआ। मजदूर लोग पिछली शाम अपना सामान समेटकर चले गए थे। दूसरे दिन सुधा ने जनार्दन बाबू के यहाँ पहुँचते ही सीधे अपने कमरे जाकर नोटबुक उठाई और रसोईघर से शुरू किया—एक-एक कमरे में जाकर मिलान करेगी, उस कमरे के मुतल्लिक जो-जो चीजें उसकी नोटबुक में दर्ज थीं, वे हुई या नहीं।

जनार्दन बाबू अपने बेडरूम में खिड़की के नीचे रखी आरामकुरसी पर अधलेटे से बैठे एक किताब में व्यस्त थे। सुधा उस कमरे में पहुँची तो बोले, “आओ...आओ सुधा। भई तुमने तो घर की कायापलट करवा दी।”

“अच्छा लगता है न अब?”

“हाँ, चीयरफुल! मेरे इस कमरे की तो तुमने इतनी शक्ल बदल दी है कि अब यहाँ से उठने का ही मन नहीं करता। बाहर स्टडी में तभी जाता हूँ, जब किसी से मिलना होता है। मेरे एक-एक टेस्ट का खयाल रखा तुमने और मुझसे बिना पूछे। कैसे जान गईं तुम?...”

सुधा झेंप गई...जितना वह जानती है जनार्दन बाबू को, दूसरा और कौन जानता होगा...वह हलके गर्व से भर गई।

“एक-दो दिन जब यहाँ काम चल रहा था, आपको दूसरे कमरे में रहना पड़ा...”

“अरे, वह कुछ नहीं। आओ बैठो...यहीं बैठकर कॉफी पीते हैं। कमरे के नए ‘लुक’ को सैलीब्रेट किया जाए...” जनार्दन बाबू ने कॉफी वहीं लाने के लिए रामू को आवाज लगा दी।

बड़ी आरामकुरसी जिस पर जनार्दन बाबू तब थे, उसके सामने एक छोटी कॉफी टेबल—ये तो सुधा की लिस्ट में थे, कॉफी टेबल के सामने, इस तरफ यह आधी आरामकुरसी रखी है न, एकदम खड़ी, जैसी कुरसियाँ दफ्तर में हैं...न ही पूरी आरामदेह...जैसी वह जो सामने थी, जिस पर जनार्दन बाबू बैठे थे। यह दफ्तरवालियों से थोड़ा बड़ी...बीच में आरामदेह— कट...उसने अपनी नोटबुक पर उड़ती-उड़ती नजर डाली...हाँ...उसकी लिस्ट में यह भी थी, इसी डिजाइन की। क्या यह उसने अपने लिए? मतलब, वह जानती थी कि वही इस पर बैठा करेगी—जनार्दन बाबू पूरी रिलैक्स मुद्रा में बड़ी कुरसी पर सामने, आधा आरामदेह इस कुरसी पर वह...मंत्रालय में उनकी पुरानी सलाहकार, अब उनके ट्रस्ट की डायरेक्टर। दोनों के रिटायरमेंट के बाद अब घर में साथी भी—कंपेनियन!

सुधा उस कुरसी पर बैठ गई।

“इस कमरे की सजावट...सजावट नहीं...वह तो यहाँ है ही नहीं...बिछावट कहिए, जब पहली बार देखी तो लगा कि तुम मुझे जितना समझती हो, उतना जीवन में किसी ने नहीं समझा। मैं यही...इतना ही चाहता था। कोई दूसरा होता तो मुझे खुश करने की खातिर या ज्‍यादा उत्साह में इसे फूहड़ सजावट से भर देता। यह कमरा तुमने इतना प्रीतिकर बना दिया। कमरे का भी व्यक्तित्व होता है, वह भी एक दोस्त की तरह तुम्हारा साथ दे सकता है। यहाँ रहकर, इस खिड़की से बगीचे...वहाँ पौधे...हरियाली और दूर के पेड़...इन्हें देखते हुए जिंदगी काटी जा सकती है। अच्छा सुधा! तुम्हें नहीं लगता, जरूरत से ज्यादा सजावट नहीं, सादा सजावट है, जो आदमी का सहारा बनती है।”

“उसे हमारे स्वभाव से मेल खाता हुआ भी होना चाहिए।”

“तुम्हें कैसे मालूम हुआ कि यही है जो मेरे स्वभाव से...”

“मैं नहीं जानूँगी तो और कौन जानेगा!”

एक लहर जनार्दन बाबू के भीतर, नीचे उन्हें सिहरन से भरते हुए उतर गई। कहाँ थी यह...थी तो, लेकिन पहले कभी इसमें यह नहीं दिखा कि वह उन्हें इतना समझती है और उसके अनुसार इतना खयाल रख सकती है!

“और क्या-क्या जानती हो मेरे बारे में?”

“एक-एक करके गिना तो नहीं सकूँगी...जरूरी भी नहीं है। आज जितना जरूरी है, वह जानती हूँ...कल जो जरूरी होगा, उसे अपने में से निकाल लाऊँगी। वह मेरे अंदर अभी भी है, भले उसे इस तरह न जानती होऊँ, जैसे आप बताने को कहते हैं।”

रामू कॉफी की ट्रे ले आया, साथ में दो अजवाइन स्ट्रा, जो सुधा ने रसोई में खास रखवाए थे—जनार्दन बाबू जब भी चाय या कॉफी लें, साथ में ये जरूर रखे जाएँ। खाली पेट चाय-कॉफी कतई नहीं। जब पहली बार रामू ये स्ट्रा चाय के साथ लेकर आया था, तभी जनार्दन बाबू ने समझ लिया था कि जरूर रसोई में यह सुधा का जोड़ा हुआ आइटम होगा।

“अच्छा सुधा!” रामू के चले जाने के बाद जनार्दन बाबू ने कहा, “घर तो तैयार हो गया। अब आगे मुझे क्या करना है...यह बताओ?”

“आप बेहतर समझते हैं।”

“पिछले दिनों मैं यह सोचता रहा हूँ कि मेरी जिंदगी का ज्यादा हिस्सा राजनीति में बीता है, शायद इसीलिए मैं बाकी जिंदगी भी उसी से, उसके आसपास की चीजों से भरने की सोचा करता हूँ...जबकि संसार में, जीवन में इसके अलावा और कितनी चीजें हैं। क्यों हम वही-वही करना चाहते हैं, जो करते रहे हैं, क्या उसके अलावा कुछ और जानते नहीं...इसलिए?”

“आपने इतना पढ़ा है, दूसरी चीजों के बारे में आप जानते नहीं...यह नहीं माना जा सकता।”

“फिर क्यों मैं उन्हीं-उन्हीं चीजों पर आ जाता हूँ...चाहे ट्रस्ट खड़ा करना हो, जिसकी तुम डायरेक्टर हो, चाहे ट्रस्ट का एक गाँव गोद लेने की प्रोजेक्ट हो...”

“च्वॉइस की बात है। हम जानते तो कितनी चीजें हैं, करने के लिए कुछ को ही चुनते हैं...यह हमारी च्वॉइस है।”

“मुझे हमेशा अपने लिए की जानेवाली चीजों की बनिस्पत समाज के लिए की जानेवाली चीजें ज्यादा महत्त्वपूर्ण लगीं...लेकिन अब लगने लगा है कि बाहर तो सिर्फ खेल है...चलता रहेगा, मुझ जैसे कितने आए, चले गए...और आएँगे, वे भी चले जाएँगे...तो अब वह खेल दूसरों के लिए छोड़ मैं अपना खयाल करूँ, शेष जीवन अपने लिए जिऊँ...लेकिन तब लगता है कि उम्र के इस मुकाम पर पहुँचकर वहाँ किया ही क्या जा सकता है, असल तो जा चुका, बचा ही नहीं कुछ?”

“जो बचा है...क्या पता वही असल हो?”

“क्या...?”

“जीना...पहले आप जो सामने था, उसमें इधर से उधर होते थे, वही जीना लगता होगा...पर वह था क्या। अब जो चीजें आप अपने लिए सँजो रहे हैं, माने अपने लिए जी रहे हैं। तो जिंदगी और बेहतर ढंग से जिएँ।”

“बेहतर माने...?”

“माने जो आपको ज्यादा तृप्ति देता है, ज्यादा प्रीतिकर लगता है वह करें।”

“तुमने इतनी अच्छी दिनचर्या तो बिठा दी है। उसके हिसाब से चल रहा हूँ।”

“वह तो दिनचर्या है, दिन काटने और स्वस्थ रहने के लिए। उसमें अब दिल को भरनेवाली चीजें जोड़‌िए।”

“वे कौन सी चीजें हैं?”

“यह हमें ही अपने लिए ढूँढ़ना होता है।”

“तुमने ढूँढ़ लीं, तुम्हारे अपने लिए कौन सी चीजें हैं?”

“जो मैं कर रही हूँ। मन की चीजें हमारी दिनचर्या में आ जाएँ तो फिर हमें और क्या चाहिए।”

“तुम तो बड़ी समझदार हो भाई।”

“आपको ऐसा लगता है। आपके जितना पढ़ा नहीं है...शायद इसलिए...”

जनार्दन बाबू सोच में पड़ गए। सचमुच बहुत पढ़ा-लिखा होना भी बाधा है। इस मायने में महिलाएँ जीवन की बड़ी व्यावहारिक समझ रखती हैं, बुनियादी चीजों से जुड़ी रहती हैं...आजीवन। इस तरह जीवन से सटकर चलती हैं।

“अच्छा सच बताओ...मेरे लिए जो तुम इतना करती हो, यह अपने मन की वजह से या मुझे उपकृत करने के लिए?”

“उपकृत माने...?”

“तुम्हें लगा होगा कि पहले मैंने तुम्हारे लिए इतना किया, अपना विशेष सलाहकार बनाया...उसका प्रतिदान करना चाहिए, ऋण महसूस करती हो, उऋण होना चाहती हो।”

“इस तरह अलग-अलग खानों में मैं नहीं सोच पाती...सबकुछ मिला-जुला है, जो अब मेरा मन बन गया है। मैं जो भी करती हूँ...किसी भी तरह की बाध्यता से नहीं, मन करता है, इसलिए करती हूँ। करती भी क्या हूँ...जीती हूँ अपनी जिंदगी...यहाँ, इस तरह...”

“और जीना सिखा रही हो मुझे...” जनार्दन बाबू ने थोड़ा हँसते हुए जोड़ा।

“उस काबिल मैं नहीं हूँ।”

“तुम्हें मुझसे कोई खतरा महसूस नहीं होता?”

“आपके साथ मैं पहले भी सुरक्षित थी, अब भी हूँ।”

“तुम्हारी नजदीकियों से मैं ही खतरा महसूस करता होऊँ तो...?”

“उससे खतरा महसूस क्यों हो? जब महसूस हो सकता था, जब हमारी उम्र थी...तब तो महसूस किया नहीं।”

“तब बाहरी समाज, प्रतिष्ठा वगैरह का डर रहा होगा।”

“आप में वह डर कभी नहीं था, न अब है। खतरा-वतरा...ये तो खयाल हैं, जो किताबों से आप तक आते हैं, आपके स्वभाव से नहीं उपजते।”

जनार्दन बाबू सोचने लगे तो सुधा ने उन्हें जो सामने था, उधर खींचा—

“बाकी घर भी देख लूँ। मेरी लिस्ट के हिसाब से सारा काम हो गया कि नहीं, कुछ बाकी रह गया होगा तो मोहन को लिखा दूँगी। वह सी.पी.डब्ल्यू.डी. से बात कर लेगा।”

“मेरा यह कमरा देख लिया?”

“इसके लिए तो सर्टिफिकेट भी मिल गया।”

सुधा हँस दी, कॉफी का आखिरी घूँट लेकर उठ गई।

“गाँव का क्या सोचा?” जनार्दन बाबू चाहते थे, वह और बैठे।

“अगली बैठक में इस बाबत बात करूँगी। अभी यह देख लूँ।”

सुधा चली गई तो कमरे में सूनापन उतर आया। ‘तो क्या यह कमरा इसलिए खूबसूरत था कि सुधा यहाँ बैठी थी...बड़ी-बड़ी बातें जो कमरे के बारे में सुधा से कहीं, वे...’

सुधा से यह कौन सा संबंध है, जो उन पर लता की बेल की तरह चढ़ता चला आ रहा है, उनके दिल-ओ-दिमाग को चिपकने के लिए दीवार-सा बनाते हुए। सुधा पिछले कितने वर्षों से साथ रही है...करीब-करीब लगातार। कभी उससे अंतरंग होने का मन हुआ तो जनार्दन बाबू स्टियरिंग को दफ्तर के काम की तरफ मोड़ देते थे, पीछे-पीछे सुधा चली आती...वह भी खुद को काम में डुबो लेती।

तब कुछ नहीं हुआ, क्योंकि जनार्दन बाबू दूसरे नशे की गिरफ्त में थे। सुधा की तरफ से कुछ यों नहीं हुआ, क्योंकि जनार्दन बाबू...का कद इतना बड़ा था, उसे वह हमेशा एक अभेद्य दीवार जैसे खड़े दिखते होंगे। राजनीति का नशा उतरा, वे खाली हो गए तो यह रंग चढ़ना शुरू हुआ, सुधा के लिए दरवाजा खुला तो वह भी चली आ रही है...

क्या यह प्रेम है? उम्र अब प्रेमवाली तो नहीं। सुधा का स्पर्श वह स्फुरण नहीं पैदा करता जैसा कि स्मृति का शरीर छू जाने पर हुआ था। वहाँ झनझनाहट हुई थी, यहाँ थमा-थमा सा सुकून महसूस होता है...क्या इसलिए कि स्मृति युवा है, सुधा उम्र के उतार पर। दोनों ही उनकी बौद्धिकता से प्रभावित हैं, स्मृति तो करीब-करीब फिदा है। दोनों ही विवाहिता हैं। स्मृति के साथ कोई लंबा संबंध बनता नहीं दिखता, जबकि वह विवाहित जीवन से अलग अपना कोई आधार तलाश रही है। सुधा के साथ बन रहा क्या बन गया है, क्या सामीप्य की सुविधा या कि दोनों की उम्र में बहुत फासला नहीं है, इसलिए या इसलिए कि उनका साथ पुराना है!

जनार्दन बाबू का लाख मन करे...सुधा उनके साथ यहाँ चौबीस घंटे क्या, एक-दो घंटे से ज्यादा नहीं रह सकती। जो वह कर सकती है, कर रही है—घर सँभाल देना, ऐसी व्यवस्था कर देना, जिससे कि उनकी जिंदगी ज्यादा से ज्यादा आरामदेह हो सके। इधर वे हैं कि बढ़े चले जा रहे हैं...आगे...और आगे। आश्रित होने की आदत जिसे एक बार पड़ी तो वह और ज्यादा आश्रित होता चला जाता है, पूरी तरह टिक जाना चाहता है, अपना सारा बोझ साथी पर लाद देना चाहता है।

अगर उनकी जरूरत यह है कि एक महिला उनके साथ यहाँ चौबीसों घंटे रहे तो जनार्दन बाबू अभी भी सुधा को वहीं स्थापित कर दें, जहाँ वह पहले थी, इतने सालों रही। चौबीसों घंटे साथ रहने के लिए कोई दूसरी ढूँढ़ लें...अपनी उम्रवाली, विधवा होगी तो वह और बाहर लोग भी जनार्दन बाबू का उस महिला के लिए उपकार ही मानेंगे। सुधा सालों से साथ है, तभी वह उन्हें इतना समझती है, उसी से यह माधुर्य उपजता है...पूरे समय का साथ सुधा का ही हो सकता है। किसी नए के साथ...वह प्रयोग ही होगा, आज नहीं कल धमाका होगा...तब वे उससे दूर होने की कोशिश करेंगे, हुए तो हंगामा मचेगा...‘जनार्दन बाबू इतने क्रूर!’

कितना अजीब...कि राजनीति से छुट्टी पाकर, पत्नी के दिवंगत होने, परिवार के न होने के बाद भी जनार्दन बाबू बँधे हुए हैं...वह भी उन्हीं चीजों से। जैसे कैद में हैं। साधारण जीवन—जिसे जीने का सोचते हैं—उसके लिए भी स्वतंत्र नहीं। सींखचे...थोड़ा दूर पर गड़ी जरूर हैं, अब भी चिलकने लगती हैं...

और सुधा कहती है कि खतरा-वतरा न वे पहले महसूस करती थी, न अब करती हैं...

गलत, जनार्दन बाबू को भले ही उनकी पार्टी ने एक किनारे फेंक दिया हो, जनता में वे अब भी उसी पार्टी के सम्माननीय सदस्य हैं। पब्लिक-फिगर हैं, फ्रेम में जड़े हुए। वृहत्तर समाज या देश में जिनकी पहचान बन जाती है, उन पर बंदिश लगातार रहती है...वे अपने मन का जो चाहे नहीं कर सकते। ‌फिल्मी दुनिया में छूट होती है...यों कि वहाँ उनकी ख्याति-कुख्याति पहले से ही—परदे पर उन्हें बदल-बदलकर किसी के भी साथ देखकर बनी होती है। वहाँ कोई किसी के साथ बिना विवाह रह सकता है, दूसरा-तीसरा विवाह कर सकता है, पत्नी...बच्चों के होते हुए विवाह कर सकता है...

जनार्दन बाबू ऐसा कुछ नहीं कर सकते; क्योंकि समाज में उनकी एक छवि है।

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सुधा की तैयारी आज ट्रस्ट संबंधित कई मुद्दों पर बातचीत के लिए थी, लेकिन जनार्दन बाबू का मन नहीं दिखा तो वह उठ गई। खिड़की का परदा उठा दिया तो सामने का भव्य दृश्य कमरे में घुस आया। सुधा मुग्ध...वहीं ठिठकी खड़ी रह गई, सामने के दृश्य में डूबी। बाहर खिड़की के नीचे फूलों की क्यारी, फिर लाल मुरम की पगडंडी...फिर हरी घास का फैलाव...उस पार ऐसा ही...रंग ही रंग। आखिर में एकदम पीछे मझोले दरख्तों की कतार...हवा में झूमते वे पेड़ जैसे पूरे घर में पंखा सा झलते थे...

“कितना खूबसूरत नजारा दिखता है यहाँ से...” बाहर के दृश्य में खोए-खोए सुधा ने कहा।

जनार्दन बाबू भी उठकर पीछे से आ गए। सामने प्रकृति का वह दृश्य, जो खिड़की खोलती थी...बगल में सुधा, जिसने वह खिड़की खोली। प्रकृति सुधा के रास्ते उनमें उतर रही थी।

“तुमने यह खिड़की मेरे लिए खोली, इसकी वजह से मेरा यह कमरा भी खिल उठा।”

“खिड़की तो पहले से ही थी।”

“हाँ, लेकिन मेरे ध्यान में यह कहीं नहीं थी, इसे जीवित किया तुमने। तुम्हें भले पता न हो...यह विचार कि यहाँ से यह दृश्य दिखेगा, मैं उसे देखा किया करूँगा, उससे मुझे शक्ति मिलेगी...ये तुम्हारे सोचने से नहीं आए। इन्हें तुम्हारा मन लाया...जो तुम मेरे लिए महसूस करती हो वह...सुधा तुम मेरे लिए इतना करती हो...और मैं तुम्हें कुछ नहीं दे पाता...यह पछतावा मुझे छोड़ता नहीं।”

“मुझे तो मिल जाता है। कितना कुछ...”

“जैसे...”

“जैसे...जैसे...यह स्वतंत्रता ही—कि मैं इस घर को वह रूप दे सकती हूँ, जो मैं चाहती हूँ। मुझे यह घर अपना घर लगता है। यहाँ वह है, जो मेरे उस घर में नहीं है...अपनत्व की सुगंध उठती है यहाँ की दीवारों से...”

“बस...यही...” जनार्दन बाबू उचक गए, जैसे इस शब्द की तलाश उन्हें कब से थी, यह उन्हें सुधा से ही मिलना था! यह उन्हें अपनी पहचान देना था, उसको भी, जो उन दोनों के बीच था।

“हाँ, अपनत्व ही। सुधा! प्रेम से भी बड़ी चीज है यह। प्रेम की आयु इतनी लंबी नहीं होती। प्रेम का तो पता नहीं कितने दिन रहे, रहे न रहे...अपनत्व बराबर रहता है। यह नदी की वेगवती धारा नहीं, मद्धिम गतिवाला स्थायी बहाव है। हमारे बीच यह पहले भी था, सालों...जब तुम मेरे साथ मंत्रालय में रहीं, हमेशा रहा, यहाँ तक चला आया—जहाँ तुम मंत्री की सलाहकार से चलकर मेरे जीवन की सलाहकार हो गई हो।”

सुधा के चेहरे पर लाली बिखर गई। गोरी वह थी ही...चेहरे से जैसे लाल किरणें फूट रही थीं। उन्हें किसी-किसी तरह सँभाले हुए वह अपने कमरे की तरफ चली, जनार्दन बाबू सोचते रह गए...

‘सुधा उनके साथ कब से है...पहले कभी इतनी सुंदर नहीं दिखी। किसी व्यक्ति के भीतर का प्रेम ही है, जो उसे हमारे लिए सुंदर बनाता है। गलत थे वे, जो कभी यह सोचते थे कि सुंदरता प्रेम को उकसाती है। सुंदरता...वह होती ही इसलिए है कि वहाँ प्रेम है। सुंदर व्यक्ति में अगर हमारे लिए प्रेम नहीं है तो हमारे लिए साधारण ही है। सुधा कुशल गृहणी की तरह घर का इंतजाम इस तरह करती है, जैसे यहाँ रहती हो...जनार्दन बाबू की सेहत का खयाल रखती है, उनके एक-एक मनोभाव की पहचान है उसे। वह आती है तो घर रोशनी से भर जाता है।’

प्रेम स्थायित्व की माँग करता है—नई आयु हो तो अपने साथी को पूरा पाने, विवाह आदि की तरफ दौड़ता है...और नहीं तो चौबीसों घंटे साथ रहने की चाहना ही...जैसी कि जनार्दन बाबू के मन में अब भी अक्सरान उठ बैठती है। उनके और सुधा के बीच जो है...उसे पहचानने, फिर उसे जीने के लिए जो शिक्षा, समझदारी, प्रौढ़ावस्था चाहिए...वह दोनों के पास है। फिर...

‘ऐ जनार्दन बाबू!’

अपनत्व को बचाए रखना है तो उसे प्रेम के पागलपन से दूर रखना होगा, प्रेम के ताप से कहीं वह झुलस न जाए। सुधा में तुम पूरी तरह डूब न जाओ...इससे बचने के लिए जरूरी है कि यह याद रखो कि तुम नेता पहले थे, जीवन भर रहे—सफल या असफल, सवाल यह नहीं है—अब भी वह हो।

नेता को भर्त्सना और तिरस्कारों की नजरों से ही क्यों देखा जाए, जैसी कि आज फैशन है—नेता माने गया-गुजरा, राजनीति माने गंदा काम। क्या कोई नेता तभी है जब वह मंत्री-सांसद-विधायक...या कम से कम किसी पद पर हो...

तुम लिखो। अपने अनुभवों से सीख लेते हुए, देश को दिशा-निर्देश देने के खयाल से, ईमानदारी से, पार्टी विचारधारा से खुद को मुक्त रखते हुए, स्वतंत्र होकर लिखो...

अवकाश प्राप्त, उम्रदराज नेता का वह भी एक काम है।

एच.एक्स.-९४, ई-७

अरेरा कॉलोनी, भोपाल-४६२०१४

दूरभाष : ९८२७५६०११०

—गोविंद मिश्र

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