दो नवगीत

दो नवगीत

पर यहाँ बच्‍चे नहीं हैं

शाम है औ’ पार्क भी है

पर यहाँ बच्‍चे नहीं हैं

लौट जाएँ, आप भी,

हालात कुछ अच्छे नहीं हैं

फिसलपट्टी पर उदासी डोलती,

सुनसान झूले

दिख रहे हैं एक-दो चेहरे

कि जैसे राह भूले

बादलों में सनसनी है,

धूप के लच्छे नहीं हैं

डूबता सूरज निहारें

खिड़कियों से बड़े-बूढ़े

हर कहीं संवाद के हैं

दर्द से दुःखते मसूड़े

बात भी अब क्या करें,

जो बात के कच्‍चे नहीं हैं

सुबह हो या शाम,

पत्ते शाख पर हिलते नहीं हैं

रास्ते भी अनमने हैं,

मोड़ पर मिलते नहीं हैं

है हवा भी डरी-सहमी

फूल के गुच्छे नहीं हैं

मास्क पहनकर हवा घूमती

बतियाहट भी लगती है

अब बंद किवाड़ों जैसी

मैदानों की रातें भी

हो गईं पहाड़ों जैसी

मास्क पहनकर हवा घूमती

चुप-चुप आए-जाए

दिन की धूप चमकती,

मन की धूप मगर सँवलाए

रिश्ते-नातों की गरमी भी

लगती जाड़ों जैसी

दीया जलाने लेकिन

जलता सा अँधियार टटोलो

शीशे के आगे जाओ

खुद से बतियाओ-बोलो

सारी दुनिया सिमटी है

अपने में, बाड़ों जैसी

समय हुआ है रुकी रेल सा

ठहरे पानी जैसा

बाजारों को भूल गया है

फटी जेब का पैसा

कठिन जिंदगी पिरा रही है,

दुखती दाढ़ों जैसी

 

‘रामेश्वरम्’

ए-१११, मेंहदौरी कॉलोनी

इलाहाबाद-२११००४ (उ.प्र.)

दूरभाष : ०१७८३९७९२४०२
यश मालवीय

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