लवासा : एक सुखद यात्रा

लवासा : एक सुखद यात्रा

लवासा के बारे में मैंने बहुत कुछ सुन रखा था, लेकिन देखने का मौका नहीं मिला था। जब श्रीकांत मकर संक्रांति में सप्ताह भर के लिए घर आया तो मैंने अपने मन की बात उसके सामने रखी।

सोचने की क्या बात है? मैं लौटकर पुणे जाता हूँ और सबसे बातचीत करके प्रोग्राम बना लेता हूँ। सच पूछिए तो इसी बहाने हम भी देख लेंगे। हमने भी आपकी तरह बहुत कुछ सुना है, लेकिन देखने का अवसर नहीं मिला आजतक।

और कोई जगह देखने लायक उसी रूट पर हो तो उसे भी टैग किया जा सकता है इस प्रोग्राम के साथ। चूँकि श्रीकांत प्लान मास्टर है, इसलिए मैंने सबकुछ उसी पर छोड़ दिया। एक दिन फोन आया उसका कि सब व्यवस्था कर ली गई है। आप और मम्मी पहले हैदराबाद, फिर बैंगलोर होते हुए पुणे आ सकते हैं। सप्ताह भर का प्रोग्राम है, यहाँ हम एक अप्रैल को सिकंदराबाद एक्सप्रेस से सिकंदराबाद आ गए। यहाँ हम अपने एक नाती शुभम एवं एक नतिनी मोनिका के साथ कुछेक रोज के लिए अपने लड़के रमाकांत के यहाँ रुक गए। रमाकांत की शिकायत थी कि हम मम्मी-डैडी उससे मिलने नहीं आते, जबकि काम करते साल भर से ज्यादा हो गया। हम दस दिनों तक रहे। घर में काफी जगह थी और सभी सुविधाएँ उपलब्ध थीं। मेरा एवं मेरी पत्नी का वक्‍त घर के काम–धंधों में ही निकल जाता था। शाम को थोडा वक्त मिलता था तो हम महाभारत सीरियल डी.वी.डी. पर देख लिया करते थे।

नौ तारीख को शुभम एवं मोनिका का एग्जाम था। ग्यारह अप्रैल को हम बैंगलोर चले आए। ग्यारह से पंद्रह तक हम अपने लड़कों के पास रहे। तीन दिन अपने सगे-संबंधियों से मिलने–जुलने में ही बीत गए। पहला दिन तो हरिबाबू, जो मेरे साढू हैं, उनसे मिलने शांतिनगर, बसप्पा रोड गए। दूसरे दिन अपने समधी कमलेशजी के यहाँ गए। तीसरे दिन गीता बहन और उनके पति पुरषोत्तमजी से मिलने गए। एक दिन हम नहा–धोकर भगवान् शिवजी का दर्शन करने निकल पड़े। साथ में मेरी पत्नी थी। दोनों लड़के शिवाकांत एवं चंद्रकांत भी थे, जो हमारी सहायता में लगे हुए थे। हम यहाँ के लिए बिल्कुल नए थे। एक बार पहले २००५ के फरवरी महीने में ज्येष्ठ पुत्र श्रीकांत के रिंग सेरेमनी में हमें बैंगलोर आने का अवसर मिला था।

हम गुफा द्वार से होते हुए मुख्य स्थान पर जैसे ही पहुँचे, आसन्न मुद्रा में भगवान् शिवजी की भव्य मूर्ति को देखकर आश्चर्यचकित हो गए। ६५ फीट ऊँची इस विशाल मूर्ति को देखकर अभिभूत तो हुए ही, रोमांचित भी हो गए। ऐसा प्रतीत हुआ कि कैलाश से शिवजी पृथ्वी पर साक्षात् अवतरित हुए हैं। कलाकार ने अपनी विलक्षण प्रतिभा से शिवजी की मूर्ति को मानो जीवंत बना दिया है। हम वहीं जमीन पर बैठ गए और अपलक उनको निहारते रहे। हमने प्रार्थना की कि “सर्वे सुखिन भवन्तु, सर्वे सन्तु निरामया”, अर्थात् सभी व्यक्ति सुखी हों और सभी नीरोग हों। मैं सपत्नीक सोलह तारीख को गो एअरवेज से पुणे चला आया।

आते ही श्रीकांत ने बताया कि लवासा जाने का सारा इंतजाम हो गया है। अठारह तारीख को जलपान करके कार द्वारा निकल जाना है। हम सीधे लवासा नहीं जाएँगे। पुणे से जंगल–जंगल पहाड़ियों की वादियों से होकर सूर्य शिबीर (शिविर) पहुँचेंगे। वहाँ दो दिनों का पैकेज है। अठारह को दिनभर, रात्रि विश्राम, दूसरे दिन लवासा के लिए शाम चार बजे चल देना है। उन्नीस को रात्रि में लौट जाना है।

जैसा प्रोग्राम था, उसके अनुसार हम अठारह को दस बजे सुबह निकल गए। खडकवासला डेम, पंचीत डेम होते हुए हम बरस गाँव पहुँचे। सभी मोड़ पर सूर्य शिबीर (शिविर) का पोस्टर लगा हुआ था, इसलिए हमें पहुँचने में कोई दिक्कत या परेशानी का सामना नहीं करना पड़ा। हमने करीब दो–सवा दो घंटे में ५३ किलोमीटर की दूरी तय की। मौसम तो सुहाना था ही, साथ-ही-साथ अद्भुत प्राकृतिक छठा ने हमारा मन मोह लिया। चारों तरफ पहाड़-ही-पहाड़ हरे–भरे वृक्षों से आच्छादित। बीच में झीलों व नदियों की कलरव करती जलधारा सुदूर तक फैली हुई मनोरम घाटियाँ। इन सभी के बीच से पहाड़ काटकर बनाई हुई सड़कें। सड़कों के किनारे हरे–भरे पेड़–पौधे। कहीं–कहीं लाल–पीले, गुलाबी व सफेद फूलों के वृक्ष हमारे मन–प्राण को आकर्षित करने के लिए पर्याप्त थे।

हमें शीघ्र ही दो सुसज्जित कमरे दे दिए गए। लंच का समय हो रहा था, इसलिए जल्द हम सामान वगैरह रखकर डायनिंग हॉल में आ गए। सैकड़ों स्कूली बच्चे–बच्चियाँ लंच कर रहे थे। समर स्पेशल पैकेज हैं—तीन दिन, चार दिन एवं छह दिनों के लिए। सभी तरह के खेल-कूद एवं मनोरंजन की व्यवस्था यहाँ पर है। हम बच्चों एवं बच्चियों के सभी प्रोग्राम में शरीक हुए तो हमें बहुत सी बातों की जानकारी मिली। घूमते–फिरते हम काफी थक चुके थे। रात्रि में चारों तरफ शांति–निस्‍तब्धता। दूसरे दिन भी हमारा वक्‍त घूमने–फिरने एवं जानकारी हासिल करने में बीता। संध्या साढ़े चार बजे के करीब हम लवासा के लिए निकल पड़े। हम सर्पीली सड़कों से चलते हुए साढ़े पाँच के लगभग लवासा पहुँचे। अठारह किलोमीटर की दूरी सूर्य शिबीर (शिविर) से लवासा का सौंदर्य देखकर हम चकित हो गए। चौड़ी सड़कें जगह–जगह सुरक्षा–प्रहरी, मनमोहक पुष्प-लताएँ एवं वृक्ष, शहर के मध्य में अति सुंदर एवं मनोरम झील। झील के किनारे खूबसूरत रंगों में रँगे व सजे–सजाए पंक्तिबद्ध बहुमं‌जिली मकान, होटल एवं रेस्त्राँ, आवास–गृह एवं अतिथि–गृह, बैंक एवं ए.टी.एम. की सुविधाएँ सुलभ। सरकारी एवं गैर-सरकारी सूचना केंद्र। झील में बोटिंग करने की सुविधा, रेलवे इंजिननुमा बस में ‘मेरी गो राउंड’, विशेष कर शिशुओं के लिए चारों तरफ घुमाने का प्रबंध। हम झील के पुल तक गए और बीच में लवासा के मनोरम छवि के अवलोकनार्थ कुछेक मिनट के लिए रुक गए। हम जिधर नजर दौड़ाएँ, उधर ही मनमोहक दृश्य, जो नयनों के अतिरिक्त हमारे मन व प्राण को भी शीतलता प्रदान कर रही थी। समय रुकता नहीं। किसी की प्रतीक्षा भी नहीं करता। वह मंथर गति से आगे बढ़ता ही जाता है।

धीरे–धीरे अँधेरा छाने लगा। सूर्यदेव नित्य की भाँति अस्त होने लगे। हमारा पोता स्पर्श की जिद पर चिल्ड्रेन पार्क की ओर चल दिए। पता चला, समय–सीमा समाप्त हो जाने से न तो झील में बोटिंग की जा सकती है, न ही ‘मेरी गो राउंड’ का आनंद उठाया जा सकता है। श्रीकांत ने कहा, ‘हम दूसरी बार आएँगे तो जल्द आएँगे और बोटिंग तथा मेरी गो राउंड का लुत्फ उठाएँगे। देखा, पोते की आँखें इन सबका आनंद न उठाने की वजह से आँसुओं से डबडबा गईं। हमें भी थोड़ा अफसोस हुआ। लेकिन सबसे ज्यादा दुःख उसकी माँ अमृता को हुआ, जिसे शब्दों में वर्णन नहीं किया जा सकता।

शिशु का लगाव जितना माँ से होता है, शायद किसी से नहीं। इसलिए शिशु को किंचित् मात्र कष्ट पहुँचने पर माँ को बहुत कष्ट होता है।

हम सात बजे के करीब पुणे के लिए निकल पड़े। टू लेनिंग रोड पूरी पक्की बीच में विभाजन। शहर में स्ट्रीट लाईट हम चलते रहे, चलते रहे, रास्ता खत्म होने का नाम ही नहीं ले रहा था। पता चला, लवासा से पुणे कुल सत्तर किलोमीटर है। पहाड़ी घुमावदार सड़कें हैं, इसलिए पहुँचने में दो–तीन घंटे का वक्त लग सकता है। हम दासवे रोड से चल रहे थे। सीमा खत्म हुई तो जान में जान आई।

हमने रास्ते में ही एक होटल में खाना खा लिया। आवास पहुँचे तो रात्रि के करीब दस बज रहे थे।

लवासा एक विकासशील पर्यटक स्थल के रूप में उभर रहा है। इसका सौंदर्य, विशेषकर प्राकृतिक छठा, अनुपम है। आनेवाले समय में यह स्थान पर्यटकों के लिए विशेष आकर्षण का केंद्र होगा, ऐसा मेरा विश्वास है।

४०६  श्रीअवंथी वूड्स, नोबोनगर,

बनरघट्टा, बेंगलुरु–५६००७६

दूरभाष : ९३०४८८५१८७

दुर्गा प्रसाद

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