छाया

अपनी ही लिखी कहानी की अंतिम प‌ंक्तियाँ—‘और वह शून्य में नजरें लगाए खिड़की से बाहर देखती रही।’ वैसे ही छाया खिड़की से बाहर देख रही थी। ‘कथानंद’ पत्रिका के दीपावली विशेषांक में छपी कहानी का पन्ना खुला था।

पत्रिका में सबसे पहले उसकी कहानी ‘शून्य’ छपी थी। आर्ट पेपर पर रंगीन चित्र में नायिका खिड़की से बाहर देखती दिखाई गई थी। च‌ित्रकार ने उसकी निराशा, लाचारी की भावनाएँ चेहरे पर बखूबी दिखाई थीं। छाया के मन में विचार आया, ‘इस वक्त क्या मेरा चेहरा भी ऐसा ही दिखाई दे रहा होगा!’

उसी समय फोन बजा। सिस्टर मोना का फोन था। “अरे, अभी-अभी तुम्हारी कहानी ‘शून्य’ पढ़ी। बहुत अ‌च्छी लिखी हो। कहानी की नायिका तुम ही हो न? बधाई हो! नगर को कब जा रही हो?”

“अभी कुछ तय नहीं हुआ है।”

“खैर, फोन रखती हूँ। पतिदेव की कार आ गई है। शॉपिंग के लिए जाना है। बाय!”

छाया ने ठंडी साँस ली।

सिस्टर मोना उसी के साथ नर्स की नौकरी करती थी। निवृत्त होने के बाद पति के साथ आराम से रह रही है। जैसी उसकी किस्मत! नहीं तो दो भाई और एक बहन के लिए इतना कुछ करने के बाद भी मुझे क्‍या मिला? आश्रय के लिए याचना करनी पड़ रही है। बहुत बड़ी अपेक्षा नहीं है—मेरे लिए एक छोटा सा कमरा हो। उसमें एक फोन, आरामकुरसी, अपने लोगों के साथ खाना-पीना, गप्पे हाँकना, टी.वी. देखना, भानजों के साथ पत्ते-कैरम खेलना बस, इतना ही। उनपर आर्थिक बोझ नहीं डाल रही हूँ। मेरा अपना खर्च चल सके, इतनी पेंशन तो मुझे मिलेगी ही। लेकिन...बस! यह लेकिन जहाँ-वहाँ रास्ता रोके खड़ा हो जाता है।

छाया का मन अतीत में घूमने लगा। पूरा अतीत दहकता हुआ। कहीं हरियाली नहीं। पिताजी स्कूल में शिक्षक थे। अपर्याप्त वेतन में छह लोग जैसे-तैसे जी रहे थे। रोटी और पनीली दाल। कभी-कभार बैंगन की सब्जी। तीज-त्योहार पर भात बनता था। मिष्टान्न के नाम पर गुड़ मिलाकर बनाई गई गेहूँ की खीर, वह भी पर्याप्त नहीं। कभी भरपेट खाने को मिला नहीं।

माँ हमेशा बौखलाई रहती। दिन में कम-से-कम एक बार वह अपने आपसे बड़बड़ाती, ‘पता नहीं जन्म में कौन से पाप किए, जो मेरी किस्मत में यह भुगतना लिखा गया। हे प्रभो, अगला जन्म चाहे कुत्ते का दे दो, लेकिन कंगाल स्‍त्री का मत देना। भारी कपड़े, गहने, मौज-मजा न सही, लेकिन दो वक्त पेट भर खाना तो नसीब हो। मेरी किस्मत ही फूटी है, उसे कोई क्या कर सकता है!’

उसका यह बड़बड़ाना सुनते हुए पिताजी अपराध-बोध से हाथ पीछे बाँधे बरामदे में टहलते रहते। वे बेचारे स्कूल से निकलकर ट्यूशन लेते, इतवार को बनिये की दुकान पर हिसाब लिखने का काम करते। यह जो ऊपरी कमाई होती, वह छोटे-मोटे खर्च करने में चली जाती। मैं नौवीं कक्षा में थी, तब माँ अचानक मस्तिष्क में रक्ताभाव होने से चल बसी। अगले साल पिताजी को कैंसर हुआ और मेरी दसवीं की परीक्षा खत्म होने के बाद पिताजी भी चले गए। जाने से पहले पिताजी रो पड़े थे। मैंने कहा था, ‘पिताजी, आप ठीक हो जाएँगे, मत रोइए।’

‘बेटी, अब मैं क्या ठीक होऊँगा? काल सामने खड़ा है। बेटी, मैं मरने से नहीं डरता। यह तो सबके लिए अटल है। मुझे तुम बच्चों की चिंता है। तुम्हारा क्या होगा?’

मैंने उनके आँसू पोंछते हुए कहा था, ‘पिताजी, आपने जिंदगी भर राम की भक्ति की है। वही प्रभु रामचंद्रजी हमें सँभालेंगे।’

पिताजी ने कहा, ‘बेटी तुम मुझे वचन दो।’

‘कौन सा वचन, पिताजी?’

‘तुम दीनू, मनू और वत्सला को सँभालोगी।’

‘पिताजी...!’

‘मैं जानता हूँ बेटी, मैं तुम्हारे कमजोर कंधों पर बहुत बड़ा बोझ डाल रहा हूँ। मुझे यकीन है, तुम दृढ़ता से उन्हें सहारा दोगी। उनके लिए तुम्हें बहुत बड़ी कुर्बानी देनी होगी। बेटी, अपनी जिंदगी हमेशा अपने लिए नहीं होती, तुम इनका खयाल रखना, इतना ही माँगता हूँ।’

मैंने उन्हें वचन दिया था, ‘पिताजी, मैं दीनू, मनू और वत्सला को सँभालूँगी।’ और मैंने अपना वचन निभाया। लेकिन उसका सिला मुझे क्या मिला?

फिर से मोबाइल बजा।

“हलो, नमस्ते! मैं संपादक निजाम पूरकर बोल रहा हूँ। आपकी कहानी ‘शून्य’ पाठकों को पसंद आई। फोन आ रहे हैं।‌ तीन-चार पत्र भी आए हैं। बधाई हो!”

“थैंक्स।”

“अब जून में ‘सुवर्ण महोत्सवी’ अंक निकालने जा रहे हैं। उसके लिए ऐसी ही बढ़िया कहानी भेजिएगा। आप हमारी पत्रिका की माननीय लेखिका हैं। कहानी माँगने का हमारा हक बनता है। बाय द वे, आपका मानदेय का चेक भेज रहा हूँ। फिर से एक बार बधाई!”

फोन रखकर छाया खिड़की से बाहर देखने लगी। मानदेय के पैसे क्या अपने काम आएँगे? कल-परसों दीनू या दया का फोन आएगा कि छाया दीदी अचानक खर्चा आ पड़ा है, कम-से-कम हजार-पाँच सौ रुपए भेज दीजिएगा। उनकी माँग का कोई अंत नहीं है। वह फिर से अतीत में खो गई।

पिताजी के जाने के बाद उनके छोटे भाई दामू चाचा भगवान् जैसे आए। पिताजी ने कभी उनकी मदद की थी। उस एहसान को याद रखकर वे हमारी मदद करने आए थे। उन्होंने अपनी जान-पहचान से मुझे नर्सिंग कोर्स के लिए दाखिला दिलवाया। वह कोर्स मैंने प्रथम दर्जे में पास किया था। तब तक रामू चाचा हर महीने सौ-सवा सौ रुपए भेजते रहे। नर्सिंग का कोर्स पूरा होते ही आरोग्य अधिकारी से सिफारिश करके और उन्हें तीन हजार रुपए देकर मुझे नगरपालिका अस्पताल में नौकरी दिला दी। डेढ़ सौ रुपए वेतन और रहने के लिए कमरा मिला। भाई-बहन को सँभालने का वचन प‌िताजी को दिया था। लेकिन भाई-बहन का ढंग कुछ और ही था। दिनकर बारहवीं पास करके एक संस्‍था में क्लर्क बन गया। वत्सला देखने में सुंदर थी। उसे अभिनय की स्वाभाविक देन थी। कॉलेज गैदरिंग में नाटक में उसने नायिका की भूमिका की थी। उसी नाटक में नायक की भूमिका करनेवाले रोहित पटेल नाम के गुजराती लड़के से रजिस्टर मैरेज कर लिया।

मुझे बताने की भी जरूरत नहीं समझी। लड़के के पिताजी का बड़ा बिजनेस है। पति के साथ वह वहाँ खुश है। रहे बेचारी! जाते समय उसने कहा था, “मैंने मेरा सुख देखा है। इतने दिन गरीबी में बिताए। मौज-मजा तो दूर की बात, कभी भरपेट खाना भी नहीं मिला। इस नरक से मुक्त होना चाहती थी।” उसकी ये बातें मेरे कलेजे को बिंध गई थीं। मानो वह नरक मैंने बनाया था। हम भी तो गरीबी की यातनाएँ भुगत रहे थे। उसने सुख देखा, लेकिन क्या कभी यह सोचा कि बड़ी बहन का क्या? स्वार्थ! सब स्वार्थी हैं। छोटा भाई मनोहर, वह भी खूबसूरत और स्मार्ट, जो नौवीं कक्षा में स्कूल छोड़कर भाग गया। कितनी मानसिक यातनाएँ सहनी पड़ी थीं। पुलिस में शिकायत दर्ज कराने गई, तब वहाँ के सब-इंस्पेक्टर ने कहा था, “अजी, पहले उसके दोस्त, रिश्तेदार आदि से मालूम कर लीजिएगा। भूखा मरने लगा तो अपने आप लौट आएगा।” सात दिन बाद उसका पोस्टकार्ड मिला। “मुझे होटल में वेटर की नौकरी मिली है। नाश्ता, दो वक्त का खाना, वरदी और पचहत्तर रुपए वेतन। होटल के पीछे क्वार्टर्स में रहने का इंतजाम है। मेरी चिंता न करना और मुझे ढूँढ़ने का प्रयास भी नहीं करना।” उसने अपना पता नहीं दिया था। मैंने दीनू से कहा, “अरे दीनू! जाओ भई, उसे ले आओ। अपना बेटा होटल में बैरे की नौकरी कर रहा है, यह जानकर पिताजी की आत्मा को कितनी यातनाएँ होती होंगी! जाओ, उसे ढूँढ़कर ले आओ।”

“कहाँ ढूँढ़ूँ? उसने अपना पता दिया नहीं है। पोस्ट का ठप्पा भी धुँधला है। गाँव का नाम भी पढ़ नहीं सकते। अब पिताजी की आत्मा के बारे में मत सोचो। उसके खाने-पीने का इंतजाम हो गया न, बस्स!” दो साल बाद मनू का पत्र आया। “हमारा होटल मालिक दुबई में होटल शुरू करने जा रहा है और सीनियर वेटर की हैसियत से मुझे दुबई भेज रहा है। परसों जा रहा हूँ।” इस प्रकार मनू और वत्‍सला ने अपने-अपने रास्ते ढूँढ़ लिये, लेकिन यह दीनू, जो छाया दीदी से पैसे माँगना अपना अधिकार समझता है। पिताजी को वचन दिया था, इसकी याद दिलाता है। मैंने अपनी शादी के लिए पाँच-छह हजार रुपए जमा किए थे। तब दीनू ने अपनी शादी का प्रस्ताव रखा। वह अपनी संस्‍था में काम करनेवाली लड़की से शादी करने की जिद कर रहा था। मजबूरी में पैसे और सहमत‌ि देनी पड़ी। अब दोनों के वेतन में कतरब्योंत करके घर-खर्च चल सकता था, लेकिन नहीं, नाटक, फिल्म, कीमती कपड़े, होटल में खाना, अतः महीने के आखिर में जेब खाली! फिर जरूरतें पूरी करने के लिए छाया दीदी है। मैंने उसे समझाया था, “अरे, आगे की सोचकर खर्च करना चाहिए”, तब उसने बेशर्मी से हँसकर कहा था, “मैं भला आगे की क्यों सोचूँ? तुम जो हो! मौज-मजा करने की यही तो उम्र है।” निर्लज्ज दया ने हँसकर कहा था, “हाँ, ननदजी, आपकी कृपा है हमारे ‌सिर पर।” मुझे लगा था, चीख-चीखकर कहूँ कि तुम्हें जिंदगी भर पैसे देने का ठेका ले रखा है क्या? मेरी उम्र चालीस हो रही है। मेरी शादी-गृहस्‍थी का क्या? छाया का मन भर आया। उसे माधवराव पोसनीस की याद आई—गोरे, खूबसूरत, एम.ए.बी.टी. स्कूल में टीचर, विधुर थे। बाल-बच्चे नहीं थे। अस्पताल में हार्निया के ऑपरेशन के लिए दाखिल हुए थे। उन्होंने विवाह का प्रस्ताव रखा था। उसी वक्त दीनू का मेनिजाइटिस का प्रॉब्लम हुआ। उसे अस्पताल में भरती करना पड़ा। बदकिस्मती से माधवराव को ऑपरेशन के समय हार्ट-अटैक आया और वे चल बसे। दीनू ठीक हुआ, तब तक दया की प्रसूत‌ि का समय आया। लड़का हुआ। उसे जन्म से ही अस्थमा की बीमारी थी। साल भर इलाज चलता रहा। धीरे-धीरे सुधरा, फिर भी आठ साल का होने तक दवा-इंजेक्‍शन चल रहे थे। और एक लड़का व एक लड़की पैदा हुए। तीन बच्‍चों की पढ़ाई, कपड़े, फीस—सबकुछ मैं ही कर रही थी।

फिर फ्लैट खरीदने की घटना! दूनी जहाँ नौकरी करता था, उस पर संस्‍था ने हाऊसिंग सोसाइटी बनाई। दस प्रतिशत भुगतान पहले करना था, बाकी लोन मिलनेवाला था। दीनू और दया धरना देकर बैठे क‌ि, “छाया दीदी, दस प्रतिशत भुगतान तुम करो, बाकी लोन क‌ी किस्त हम चुकाएँगे। हमारा अपना घर होगा। इस अँधेरे कमरे में कब तक रहेंगे?” मैंने कर्ज लेकर पैसे दिए थे। दीनू ने अपने और दया के नाम फ्लैट रजिस्टर कराया। मैंने कहा था, “दया के बदले मेरा नाम क्यों नहीं आया?” तब दीनू ने कहा था, “तुम भी कमाल करती हो दीदी, तुम जानती हो न कि दया कितनी जिद्दी है, और नाम लिखवाने में क्या धरा है! वह फ्लैट तुम्हारा भी है। निवृत्त होने पर वहाँ रहने आओगी न!”

मैं आज सेवानिवृत्त हो रही हूँ। आठ दिन में क्वार्टर खाली करना पड़ेगा। दो दिन पहले दीनू को बताया था, “मुझे यहाँ का कमरा खाली करना है। मेरे लिए वहाँ एक कमरे का इंतजाम कीजिए।” उसने कहा, “सोचकर बताता हूँ।”

“अब सोचना क्या है?”

पोस्टमैन आया। “नमस्ते मैडम, आपकी रजिस्टरी है।” उसने हस्ताक्षर करके रजिस्टरी पत्र लिया। लिफाफे के कोने में प्रेषक दीनू लिखा था।

पोस्टमैन ने कहा, “मैडम, तुम्हें एक भेंट देना है। डेढ़-दो साल पहले मेरी माँ अस्पताल में थी, तब आपने उसकी बहुत सेवा की थी। अंतिम समय में माँ ने कहा था कि मेरी बरसी के दिन यह राम की मू‌र्ति सिस्टर छाया को भेंट कर देना। आज उसकी बरसी है, इसलिए मूर्ति ले आया हूँ। कृपया स्वीकार कीजिए। अच्छा, चलता हूँ।” पोस्टमैन चला गया।

छाया ने डिब्बा खोला। केशरी रंग के रेशमी रूमाल में लपेटी हुई पाँच इंच की खूबसूरत मूर्ति थी। छाया ने रूमाल तह करके मूर्ति उसपर रखी और प्रणाम किया। उसके मन में विचार आया कि अपने कहलानेवाले लोग पैसा देखते हैं। कौन, कहाँ की वृद्धा मू‌र्ति के रूप में अपना प्यार देती हैं। छाया ने पत्र पढ़ना शुरू किया—

“तीर्थस्वरूप छाया दीदी के साथ कल अचानक एक दुर्घटना घटी, इसलिए पत्र लिखना पड़ रहा है। फोन पर बताने से पत्र में विस्तार से लिखना ठीक लगा। आप गलत मत समझना। तुम यहाँ हमेशा-हमेशा के लिए आनेवाली हो, इस खुशी में हम रूम सँवार रहे थे। सुबह दस बजे दया के माता-पिता और चाचा-चाची आए। दया के पिताजी को लकवा मार गया है। उन्हें अस्पताल में भरती करना पड़ा। अटैक माइल्ड था। आज सुबह घर ले आए। डॉक्टर ने मसाज, व्यायाम वगैरह करने को कहा है। दया की चाची को चक्कर आ रहे थे। उनका भी चेकअप करवाया। उन्हें हाई ब्लडप्रेशर और डायबिटीज की बीमारी है। इलाज चल रहा है। चाचा-चाची के बाल-बच्चे नहीं हैं। दया इकलौती है, इसलिए उसे उनकी खिदमत करनी जरूरी हो गई है। घर का अस्पताल बन गया है। मुझे लगता है, तुम वहाँ वन रूम-किचन ब्लॉक किराए पर ले लो। तुम्हें फंड के पैसे मिलेंगे, उसमें से एडवांस दे सकोगी। पेंशन में घर का किराया और खर्च चल जाएगा।”

उसके बाद दया ने लिखा था—

“तीर्थस्वरूप दीदी को प्रणाम! उपर्युक्त पत्र में यहाँ के हालात बयान किए गए हैं। इन्होंने वन रूम-किचन के बारे में लिखा है, लेकिन मैं दूसरा सुझाव देती हूँ। यहाँ राहूरी में बहुत अच्छा वृद्धाश्रम बना है। वहाँ रहने, खाने, दवा, मनोरंजन की सुविधाएँ हैं। मेरी एक सहेली ने अपने सास-ससुर को वहाँ रखा है। वह सराहना कर रही थी। आप वहाँ रहोगी तो खाना बनाने आदि का झंझट नहीं रहेगा। अलग कमरा होने से आप वहाँ आराम से पढ़ने-लिखने का काम कर सकोगी। फंड के पैसों से वृद्धाश्रम का डिपॉजिट और पेंशन के पैसों से हर महीने का खर्च आसानी से दिया जा सकता है। आश्रम यहाँ से नजदीक है। आप जब चाहें हमें मिलने आ सकती हो, या हम तुम्हें मिलने आ जाया करेंगे।

“अरे, एक बात तो बताना भूल ही गई। तीन महीने से कर्ज की किस्त के तीन हजार रुपए दिए नहीं हैं। पिताजी और चाची की बीमारी में खर्च हो गए। आपका फंड मिलने पर आप भेज ही देंगी। दया!”

पत्र रखकर छाया फिर से शून्य में ताकने लगी। कितने खुदगर्ज हैं ये लोग! वृद्धाश्रम में जाओ, मतलब यहाँ मत आना। ऊपर से बेशर्मी से तीन हजार रुपए माँग रही है। छाया की आँखें भर आईं। मन आक्रोश से भर गया, इनसे संबंध रखना ही नहीं। कहीं दूर चले जाना है।

तभी फोन बजा।

उसने फोन उठाया। “हेलो, यह छाया तपस्वी का फोन है न? मुझे छायाजी से बात करनी है।”

“बोल रही हूँ।”

“नमस्ते! मैं अनंत बलवंत नागपुर से बोल रहा हूँ।”

“नमस्ते! बोलिए?”

“अभी आपकी कहानी ‘शून्य’ पढ़ी। पत्रिका के संपादक से आपका फोन नंबर लेकर फोन किया। कहानी अच्छी लगी, बधाई हो! हम आपकी कहानियाँ पढ़ते रहते हैं। मेरी पत्नी कामायनी ने भी आपको बधाई दी है। एक बात पूछना चाहता हूँ, आप नाराज तो नहीं होंगी?”

“पूछिए?”

“क्या आप नर्स हैं? मुझे ऐसा इसलिए लगा, क्योंकि अनुभव के बिना नर्स के काम के बारे में इतने विस्तार से कोई कैसे लिख सकता है! कितने साल से काम कर रही हैं?”

“चौंतीस साल से। आज ही निवृत्त हुई हूँ।”

“क्या कह रही हैं! यह बड़ा अच्छा संयोग है।”

“मतलब?”

“मतलब, हमें एक नर्स की तलाश है। छायाजी मेरी उम्र उनहत्तर साल है और कामायनी पैंसठ की। मैं रिटायर्ड डिस्‍ट्रिक जज हूँ। हमारा इकलौता बेटा अमेरिका में सेटल हो गया है। उसने वहीं किसी लड़की से शादी कर ली है। वहाँ उसकी बड़ी फर्म है। बँगला, गाड़ियाँ—सबकुछ है। मतलब, अब वह वहीं रहेगा। यहाँ हम दोनों हैं। पिछले पाँच साल से कामायनी को एपिलेप्‍सी की तकलीफ है। उसका खयाल रखने के लिए हमें आप जैसी नर्स चाहिए। कामायनी के शब्दों में उसे कंपेनियन चाहिए। अगर आप आ सकीं तो वह हमारा सम्मान होगा। आप सोचकर बताइएगा। यहाँ हमारा ‘कमल कुंज’ नाम का छह रूम का बँगला है। चारों तरफ से बगीचा है। पीछे सर्वेंट क्वार्टर्स हैं। वहाँ खाना बनानेवाली, माली ड्राइवर रहते हैं। दाईं ओर दो कमरे का आउट हाउस है। आगे बरामदा है। आप वहाँ रह सकती हैं। आपका खाना-पीना हमारे साथ होगा। वेतन के बारे में आमने-सामने बात करेंगे। आप हमारे परिवार की सदस्य बनेंगी। हमें छाया की माया मिले और आपको माया की छाया। फिर से एक बार निवेदन है कि आप हमारा प्रस्ताव स्वीकार करें। आप कब आनेवाली हैं, बताइएगा, आपको लेने हम दोनों स्टेशन पर आ जाएँगे। एक मि‌नट, कामायनी को आपसे बात करनी है।”

“हेलो! मैं कामायनी, इनका लंबा भाषण सुन लिया न? मैं एक ही शब्द कहूँगी—‘आइएगा’।” फोन बंद हुआ। छाया स्तं‌भि होकर बैठी रही। उसे विश्वास नहीं हो रहा था। कामायनी का एक ही शब्द मानो मातृप्रेम से पगा हुआ।

छाया ने मन-ही-मन परमात्मा का शुक्रिया अदा किया—‘हे प्रभु, आपकी लीला अगाध है। दीनू और दया का कलेजा चीरनेवाला पत्र पढ़कर मैं हताश हो गई थी। सोच रही थी कि कहीं दूर चली जाऊँ। और बस आपने इंतजाम कर दिया। उसने पोस्टमैन द्वारा दी गई राम की मूर्ति के सामने अगरबत्ती जलाई, दूध-शक्कर का नैवेद्य रखा।

अब वह उत्साहित हो गई। आगे की योजना बनाने लगी। सामान समेटना होगा। वैसे सामान ज्यादा नहीं था—कपड़े, दो-चार बरतन और किताबें। कल सुबह स्टेशन पर जाकर कलकत्ता मेल द्वारा नागपुर का आरक्षण कर लेना चाहिए। उसके बाद मैं पहला फोन उपमाल्लीमारजी को और दूसरा दीनू को। उसे कहूँगी कि मैं सिस्टर डिमेलो के साथ गोवा जा रही हूँ। वहाँ तीन सप्ताह रहनेवाली हूँ। लौटने पर फोन करूँगी।

कल दस बजे बिदाई समारोह है। फंड और बोनस का चेक मिल जाएगा। नागपुर जाने के बाद नए नंबर का सिम-कार्ड खरीदना है। मोबाइल भी नया ले लूँगी। ऐसे भी यह पुराना हो गया है। दया और दीनू का फोन आए तो उठाना नहीं है। अन्यथा गोवा से क्या-क्या लाना है, इसकी लंबी लिस्ट ‌सुनाएँगे।

उसने मेस में जाकर खाना खाया। कपड़े समेटे। दूसरे दिन सुबह चाय पीकर स्टेशन गई। उसकी किस्मत अच्छी थी। उसे आरक्षण मिल गया। उसने उमपाल्लीमारजी को फोन लगाया।

“नमस्ते, मैं छाया बोल रही हूँ।”

“वाह-वाह! बोलिए, छाया दीदी!”

दीदी संबोधन सुनकर छाया गद्गद हो गई। “मैं आ रही हूँ। कल सुबह की कलकत्ता मेल का आरक्षण मिला है।”

“बहुत खूब! हमें यकीन था कि आप आएँगी। कामायनी बहुत खुश होगी। कल सुबह हम दोनों स्टेशन पर होंगे। आप हमें आसानी से पहचान सकोगी। अजी, प्लेटफॉर्म पर जो सबसे ऊँचा आदमी होगा, वही मैं। और मेरी बगल में खड़ी नाटी महिला कामायनी के अलावा कौन हो सकती है?”

फ्लैट नं. ३०३ ब‌िल्डिंग डी-२

शिवसागर कोऑप सोसाइटी

माणिक बाग सिंहमड रोड, पुणे-४११०५१

दूरभाष : ९९२३०११६१३
—नीलकंठ नांदुरकर

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