कालड़ी से कैलाश तक

कालड़ी से कैलाश तक

भारतवर्ष की भूमि वीर-प्रसूता है। वीरता युद्धभूमि में तो प्रमाणित होती है। वह ज्ञान के संवाद-रण में भी अपना लोहा मनवाती है। वीरता जितनी मारक होती है, उतनी ही विनम्र भी होती है। शिव की तरह। राम की तरह। कृष्ण की तरह। केरल की हरीकच्च ओढ़नी ओढ़ी हुई पुण्य-भूमि के सिंधु तट से मेघ जनमता है। ताप से तपती हुई संपूर्ण भारतवर्ष की धरती पर निरापद बढ़ता जाता है। बढ़ता जाता है। सूखी माटी को भ‌िगोता है। पादपों, वृक्षों, लताओं, तृणों को सींचता है। वनपाखियों-टियापाखियों को नहलाता है। कुओं, बावड़ियों, सर-सरोवरों की गागर भरता है। नदियों-निर्झरों के घर जल-महोत्सव मनाता है। किसानों के मन-प्राण में उमंग पैदा करता है। पशुओं को हरी-हरी वसुंधरा पर विचरण करने का आमंत्रण देता है। सबके लिए तप से मुक्ति का वायुमंडल रचता है। अंत में नगाधिराज हिमालय के हिममंडित शिखरों का अपने जल से अभिषेक करता है। इन्हीं शिखरों पर ही कहीं पर शिव-शंकर महादेव समाधि लगाए बैठे हुए हैं। कैलाशपति कैलाश पर विराजित हैं। मेघ वहाँ जाकर नतमस्तक होता है। अपने पूरे अस्तित्व के साथ प्रणत होकर निशेष हो जाता है। मानसरोवर से अनादि नाद ‘अहं ब्रह्म‍ास्मि’ प्रस्फुटित होता है। कैलाश के उच्च शिखर के हिम त्रिशूल से ऊपर उठता हुआ वह नाद आकाश तिरोहित हो जाता है।

आदि शंकराचार्य के संपूर्ण का साक्षात् करने में मेघ का यह रूपक मन को बहुत भाता है। मेघ अनल-अनिल के संघात से जन्म लेता है। आकाश में हवा की पालकी पर सवार होकर क्षितिजों तक की यात्रा करता है। वर्षा बूँदों से ऋतु की प्रकृति को बदल देता है। शास्त्रज्ञ विद्याधर के पुण्य-ताप और संस्कृतिनिष्ठा के वायु सुयोग से पोते के रूप में शंकर का आविर्भाव होता है। सत्कर्म और पुण्य तीसरी पीढ़ी में फलित होते हैं। शिवगुरु और आर्यांबा शंकर को पुत्र रूप में पाकर जन्म-जन्मांतर के कर्मों का धन्यवाद करने लगते हैं। शंकर अनुपम गुणों के साथ प्रकट होते हैं। अन्यथा सात वर्ष की अवस्था में कैसे कोई वेद-शास्त्र को कंठस्थ कर सकता है। यह महादेव शिव का ही अनुग्रह है। उन्हीं का शंकराचार्य के रूप में प्राकट्‍‍य-विग्रह है। गुरुकुल में रहकर गुरु के सान्निध्य में तपकर और श्रुति के माध्यम से स्मृति में घरकर शंकराचार्य उपनिषद्, पुराण, धर्मशास्त्र, न्याय, सांख्य, योग, वैशेषिक में निष्णात हो नीरधर मेघ सरीखे लबालब हो जाते हैं। सात वर्ष की अवस्था में ही गुरुकुल से समावर्तन (दीक्षांत) के उपरांत वे माता की आज्ञा लेकर गुरु की खोज में निकल पड़ते हैं। जैसे वायु का तेज झोंका निकलता है। जैसे आतुर-आकुल मेघ निकलता है। जैसे प्रकाश-पथ पर सूर्य निकलता है। जैसे निशीथ में ज्योत्स्ना की अलकें धोता राकेश निकलता है। जैसे काल को चीरकर अमृतत्व निकलता है। जैसे हिरण्य गर्भ कलश का ढक्कन हटाकर सत्य निकलता है। वैसे ही मानो वेदों का ज्ञानकांड देह धरकर शंकराचार्य के रूप में संपूर्ण भारतवर्ष के नभमंडल पर छा जाना चाहता है।

आठ वर्ष की अवस्था का बालक शंकर गुरु की खोज में चल देता है। चल देता है—दक्षिण से उत्तर की ओर। चल देता है कालड़ी से कैलाश की ओर। चल देता है—तापशाप हरा नदी आलवाई की सजल गोद से पुण्यदा नदी माँ रेवा के तट की ओर। गुरुकुल में बालक शंकर ने सुन रखा है, इस भूतल पर भगवत्पाद गोविंद महाज्ञानी हैं। वे वेदांत के मर्मज्ञ हैं। महर्षि वेदव्यास के पुत्र शुकदेव मुनि, शुकदेव मुनि के शिष्य विख्यात वेदांती आचार्य गौड़पाद और आचार्य गौड़पाद के शिष्य गुरु गोविंदपाचार्य हैं। वे इस समय भी अपनी योग साधना में लीन हैं। ब्रह्म‍ की सिद्धि में रत हैं। वे माँ नर्मदा के तट पर गुफा में तपस्या कर रहे हैं। वे योगसूत्र के रचयिता पतंजलि के अवतार हैं।

शंकराचार्य गुरुकुल में गुरुमुख से यह अमृतवाणी सुनकर गोविंदपाचार्य का शिष्य बनने और उनसे दीक्षा लेने का संकल्प ले लेते हैं। निकल पड़ते हैं—गुरु की खोजकर उनकी शरण में जाने के लिए। जैसी भवितव्यता होती है, वैसा योग-संयोग भी बनता चला जाता है। शंकराचार्य माता आर्यांबा और पिता शिवगुरु की तपस्या के फलस्वरूप जन्म लेते हैं। तपस्या के कारण भगवान् शिव के वरदान रूप में उन्हें पुत्र शंकर की प्राप्ति होती है। पुत्र प्राप्ति की कामना में तपस्या, सद‍्वृत्ति, सदाचरण, सदेच्छा, सद्मनोभाव का सुमेल होता है, तो शंकर जैसा बेटा जन्म लेता है। सुसंस्कृत चरित्र, विचार, भाव, आचरण, चिंतन, मनन सबकी अनुकूलता और सकारात्मकता होती है, तब जन्म के साथ ही सुसंस्कार लेकर आनेवाली संतति की प्राप्ति होती है। ऐसी संतान अगले-पिछले कुलों का नाम और उद्धार करती है। समाज और राष्ट्र को भी अपने आलोक-वलय से आलोकित करती है। परंपरा का पुनर्मूल्यांकन होता है। संस्कृति में नई आभा और युगानुकूल नई मूल्यवत्ता दिपदिपाने लगती है। जीवन सौभाग्य है। संस्कृति जीवन को सुसंस्कृत करती है। धर्म जीवन को दृष्टि देता है। सनातनता अद्वैत दर्शन से जीवन को शिवत्व-पथ पर एक सबल घटक देती है। मेघ-सा श्यामल-श्‍यामल जीवन भारतवर्ष के नभोमंडल में छा जाता है, कालड़ी से कैलाश तक।

लक्ष्य सुनिश्‍चित है। मार्ग अनजाना है। वन-पथ है। गिरि-गह्व‍र हैं। वन-पशु हैं। आश्रम हैं। नदी, नद, सरोवर हैं। ग्राम हैं, वनवासी हैं। लताएँ-वेलियाँ हैं। वनफूल हैं। चौकड़ी भरते मृग हैं। शाखा से शाखा पर कूदते वानर हैं। चहचहाते पंछी हैं। गीत गाते झरने हैं। सिंह गर्जना है। चिंघाड़ते हाथी हैं। सर्र-सर्र सरकते नाग हैं। दादुर-ध्वनि  है। शीतल-मंद सुगंधित पवन है। जेठ-बैसाख की तपन है। सावन-भादों की झड़ी है। शरद की चादनी है। हेमंत की उज्ज्वला धूप है। माघ-पौष की ठिठुरन है। फागुन-चैत्र का वासंती उत्सव है। तरुवर पर कोकिल बोल रही है। वन में रूड़ा मोर नाच रहे हैं। पातळिया देहयष्टि वाला आठ वर्षीय संन्यासी इन सबमें ब्रह्म‍ के दर्शन करता हुआ चला जा रहा है। अनथक चला जा रहा है। अनवरत चला जा रहा है। उपनिषदों से निकलकर वेदांत की प्रत्यंचा से छूटे ज्ञान के तीर की तरह चला जा रहा है। वेदों के ज्ञानकांड की ध्वजा लहराती हुई दक्षिण-उत्तर, पश्‍चिम-पूरब की धरती पर दिग्विजय के प्रण के साथ बढ़ती जा रही है। यह शंकर का संकल्प है। गुरु से दीक्षा लेने की अभिलाषा है। वेदांत-दर्शन को आत्मसात् करने की आकांक्षा है। अद्वैत को समयानुकूल व्यावहारिक स्तर पर उतारने की आतुरता है। अद्वैत दर्शन और अभेद दृष्टि द्वारा सनातन धर्म की पुनस्‍‍‍‍‍र्थापना करने की उत्कंठा है। एक संन्यासी इसी धुन में दंड-कमंडल लिये सनातन पथ पर सनातन पुरुष की भाँति धावमान चला जा रहा है।

ओंकारेश्‍वर में माँ नर्मदा के तट पर गहन गुफा में परम तपस्वी गोविंदपाद ध्यानमग्न हैं। शंकर उन्हीं की शरण में आ जाते हैं। अपनी यात्रा के आरंभ में निर्जन वन में एक सरोवर के किनारे मेढक के बच्चों पर एक काले सर्प को अपनी फण की छाँव करके बच्चों को धूप से बचाते हुए देखते हैं। यह विपरीत प्रकृतिवाले जीवों को एक साथ जोड़ने की आश्‍चर्य भरी स्थिति के बारे में जानने हेतु आतुर-आकुल हो उठते हैं। पास ही खड़े एक बटुक से ज्ञात होता है कि यह शृंग गिरि क्षेत्र है। यह ऋषियों की तपस्या स्थली है। यहाँ सब बैर-भाव छोड़कर प्रेम से रहते हैं। शंकराचार्य के भीतर सारे भारतवर्ष को इसी सात्त्विक भाव से भर देने का संकल्प जाग जाता है। बाद में, बहुत बाद में उत्तर से दक्षिण जाते समय उन्होंने इसी स्थान पर ‘शृंगेरी मठ’ की स्थापना की है। सात्त्विकता से परिपूरित और प्राकृतिक सुषमा से लकदक स्थल नर्मदा कूल पर गोविंदपाद की गुफा के चौतरफा आचार्य शंकर को अपूर्व अनुभव होता है। शिष्य को मनचाहा गुरु मिल जाता है। गुरु को सुयोग्य शिष्य प्राप्त हो जाता है। जैसे धरती के गर्भ में ठहरे हुए जल को प्रवाह मिल जाता है। पंछी को पंख मिल जाते हैं। फूल को सुगंध मिल जाती है। शब्द को अर्थ मिल जाते हैं। युग-युग से मौन वीणा के तारों में झंकार बज उठती है। गुरु गोविंदपाद शिष्य शंकर को चारों वेदों के चारों महावाक्यों—‘तत्त्वमसि’, ‘प्रज्ञानं ब्रह्म‍’, ‘अहं ब्रह्म‍ास्मि’, ‘अयात्मा ब्रह्म‍’ का तत्त्वज्ञान देते हैं। महर्षि वेदव्यास के ‘ब्रह्म‍सूत्र’ की अद्वैतपरक व्याख्या शंकर को सुनाते हैं। शंकराचार्य की दिव्यदेह से ब्रह्म‍ज्योति की झाँईं प्रकट होने लगती है। गुरु को परमतोष होता है। वर्षाकाल के क्षणों में माँ नर्मदा का बाढ़-प्रवाह साधनारत गुरु की गुफा तक आ जाता है। शंकराचार्य माँ नर्मदा की स्तुति, प्रार्थना, विनती में ‘नर्मदाष्टक’ रचते हुए प्रणत हो जाते हैं। माँ नर्मदा द्वार पर रखे कमंडल में समा जाती है। दिशाएँ गूँज उठती हैं, ‘त्वदीय पाद पङ्क‍जं, नमामि देवी नर्मदे।’

गुरु की आज्ञा होती है—अद्वैतमत का प्रचार करने की। ब्रह्म‍सूत्र का भाष्य लिखने की। शंकर गुरु की आज्ञा शिरोधार्य करते हैं। गुरु का आशीर्वाद पाकर शंकर दिग्विजय के लिए प्रस्थान करते हैं। वे शंकर से शंकराचार्य हो जाते हैं। अपने गुरुभाइयों के साथ वे प्रयागराज होते हुए वाराणसी आते हैं। वाराणसी धर्म, संस्कृति का केंद्र रहा है। पंडितों, वाद-विवादों, युक्तियों, तर्कों, गूढ़-रहस्यों, व्याख्यानों, प्रवचनों, उपदेशों, पूजा-अनुष्ठानों से काशी प्रकाशित क्षेत्र रहता है। शैव, पाशुपत, पांतजल, शाक्त, गाणपत्य, जैन, बौद्ध, तांत्रिक, सिद्ध, कापालिक आदि मतों-संप्रदायों का केंद्र है। यहीं शंकराचार्य चांडाल के वेशधारी ‌शिव से ‘सर्वं खल्विदं ब्रह्म‍’ सबकुछ ब्रह्म‍ ही है—वेदवाक्य का गूढ़ार्थ प्राप्त करते हैं। भगवान‍् विश्‍वनाथ से ही उन्हें भास्कराचार्य, अभिनवगुप्त, नीलकंठ, प्रभाकर, कुमारिल भट्ट, मंडन मिश्र से शास्त्रार्थ कर अद्वैत ब्रह्म‍ की स्थापना करने का भी अप्रत्यक्ष रूप से अनुदेश मिलता है। वेदांत का मुख्य प्रतिपाद्य ‘अद्वैत ब्रह्म‍’ ही है। शंकराचार्य ब्रह्म‍सूत्र का भाष्य लिखने और अपनी साधना को शीतल धार देने हेतु विश्‍वनाथ भगवान् के दर्शन कर बदरकिआश्रम की ओर निकल पड़ते हैं। माँ गंगा के आँचल की लहर-लहर पर शंकराचार्य के विनत स्वर सार्थक और साकार होते हैं—

देवि सुरसरि भगवति गङ्ग‍े, त्रिभुवन तारिणि तरलतरङ्ग‍े।

शङ्क‍रमौलि विहारिणि विमेले, मम मतिरास्तां तव पदकमले॥

बनारस से बदरीनाथ की यात्रा देवसरि गंगा के किनारे-किनारे होती है। गंगा के किनारे उत्सव भरे हैं। उसकी लहर-लहर में उमंग है। गंगा इस पुण्य-धरा पर धर्म-प्रवाह है। धर्म अपने चार कर्म-स्रोतों में साकार होता है। सत्य, दान, दया, तप यह चार ही कर्म का सौंदर्य भी बनते हैं। यह ही धर्म को ईश्‍वर और सृष्टि के मध्य का सेतु भी बनाते हैं। गंगा सृष्टि में अनादि जल-रूप सत्य है। वह जल के दान से सृष्टि और संस्कृति दोनों का भरण करती है। वह इतनी करुणार्द्र-दयामय है कि पुण्यात्मा-पापात्मा सबको तारती आ रही है। तार रही है। वह भगीरथ के तप का फल है। वह स्वयं सृष्टि के कल्याण हेतु तपःस्फूर्त है। शंकराचार्य धर्म-स्वरूप गंगा के तटों का सौंदर्य निहारते अपनी शिखर-यात्रा पर बढ़ते जाते हैं। गंगा हिमालय से मैदान में आ रही है। प्रयागराज-वाराणसी को धन्यता दे रही है। शंकराचार्य वाराणसी-प्रयागराज, हरिद्वार, ऋषिकेश से हिमालय की ओर जाते हैं। जल ऊपर से नीचे की ओर बहता है। मेघ ऊपर की ओर बढ़ता है। उसकी पहुँच और गति गिरि-शृंगों की ओर की होती है।

हरिद्वार हरि और हर के घर का द्वार है। बदरीनाथ विष्णु धाम है। केदारनाथ शिवधाम है। देहरादून घाटी का प्रवेश द्वार है। सबकुछ अद्भुत है। बहुत चमत्कारिक और सम्मोहित करनेवाली प्रकृति-परिवेश है भारतभूमि का। ऋषिकेश ऋषियों की तपोभूमि है। यज्ञभूमि है। हिमालय में तपस्या-विभूत ऋषियों के केश हिमालय की मैदानी घाटियों तक फैले रहे हैं। जटाजूट जब खुलते होंगे, तो ऋषिकेश तक उनका विस्तार और प्रभाव रहता होगा। शंकराचार्य यहाँ बहुत भावविभोर और धर्मप्रवाह में डूबे हुए से हो जाते हैं। मंदिर-मंदिर, आश्रम-आश्रम में जाकर वे प्रणत होते हैं। विष्णु मंदिर में जाते हैं। मंदिर को विष्णु के श्रीविग्रह से विहीन पाते हैं। पागल-जिज्ञासु की तरह पूछते हैं—विष्णु की मूर्ति के बारे में। ज्ञात होता है कि आततायियों के भय से भगवान् विष्णु की मूर्ति को गंगाजल में छुपा दिया है। शंकराचार्य भक्त वत्सल विष्णु की प्रतिमा को अपने साथियों के सहयोग से बहुत खोज-बीन के बाद गंगा-प्रवाह से निकालते हैं। उसे वेद-नीति-रीति द्वारा पंडितों के माध्यम से विष्णु मंदिर में प्रतिस्थापित कराते हैं। शंकराचार्य अद्वैत ब्रह्म‍ के सिद्धांत के माध्यम से सनातन धर्म की स्थापना हेतु जनमते हैं, पर वे यह भी स्थापित करते हैं कि तीर्थ और देवालय धर्म संस्थापना के ही सगुण अंग-उपांग हैं। यह भी संदेश देते हैं कि संन्यासी, योगी, यति, तपस्वी, मनस्वी अकेले मुक्ति नहीं चाहता है। वह सबके कल्याण और सबकी मुक्ति में अपनी मुक्ति चाहता है। मुक्ति पाता है। यही है उपनिषद् का ‘यस्य सर्वमात्मैवाभूत।’

ऋषिकेश से बदरीनाथ तक का पथ प्राकृतिक रूप से अटाटूट सौंदर्यमय है। सम्मोहक है, आकर्षक है। चुंबकीय है। जादुई सुंदर है। जीवंत है। निर्गुण ब्रह्म‍ का सगुण रूप है। पत्ता-पत्ता, टहनी-टहनी, कली-कली, पुष्प-पुष्प, संवादातुर है। हिमालय शिव का विराट्-विशाल समाधि स्वरूप है। हिमालय में सृष्टि के पाँचों तत्त्व शांत-मौन क्रियाशील हैं। अनंत नील नभ का आक्षितिज शुभ्र असीम विस्तार है। भूमि की ममता की उठान अनगिनत हिम शिखरों में छलछला रही है। जल अवतार धरकर स्रोतों, झरनों, हिमनदों, नदों, सरिताओं, जलकुंडों में धावमान बिछल रहा है। पवन चर-अचर सबमें व्याप्त और स्थित ‘प्रणव-ऊँ’ का महानाद द्युलोक, अंतरिक्षलोक, भूलोक, पाताललोक में ध्वन्वित कर रहा है। कण-कण और क्षण-क्षण अंतस की आग से ज्योतित और स्फूर्त है। हिम‌श‌िखर बोल रहे हैं। बुला रहे हैं। नदियाँ वेदों की ऋचाओं का गान कर रही हैं। तृण, तरु, लता, गुल्म, यज्ञ यजन में तल्‍लीन हैं। सगुन चिरैया, चिड़ा-चिड़कली, दादुर-मोर, पपीहा-कोकिल एक अखंड बटुक संन्यासी की आगमन वेला में सप्तसुरों में छत्तीसों राग गा रहे हैं। बीहड़-अनजाना-अबूझ मार्ग शंकराचार्य के लक्ष्य-बिंदु पर सुगम हो चलता है। हिंसक पशु मैत्रीभाव से तरलाय‌ित होकर सहचर बन जाते हैं। अलकनंदा की धारा शंकराचार्य की ज्ञान विभूति को स्नान कराने हेतु आतुर हो उठती है। पर्वत, मैदान, घाटी, चढ़ाव, शिखर, उठान, निचान, तृण, घास, तरुवर, लता, पुष्प, कंकर, पत्थर, चट्टान, कोमल माटी की शंकराचार्य की हिमालय यात्रा बदरीनाथ मंदिर के द्वार पर आकर अपना अभीप्सित स्थल और अनुपम आनंद-बिंदु पाकर एक पुनश्‍चरण पूरा करती है।

बदरकिआश्रम के आगे लहर-लहरकर अलकनंदा सनातन काल से बह रही है। पीछे नर-नारायण पर्वत हैं। इन्हीं के मध्य ‘वेदव्यास गुहा’ है। अखंड शांति है। आक्षितिज प्रशांति है। अद्भुत उत्फुल्लता है। कल्याणी मौन है। आत्मिक आनंद की झोंक अनुभव हो रही है। शंकराचार्य की दृष्टि ‘व्यास गुफा’ पर स्थिर हो जाती है। इसी गुफा में महर्षि वेदव्यास ने ब्रह्म‍सूत्र की रचना की है। शंकराचार्य उसी पावन-पौराणिक-प्राकृतिक गुफा में बैठकर ब्रह्म‍सूत्र का भाष्य लिखना चाहते हैं। गुरु का आदेश है। आत्मा का संकल्प है। वैदिक धर्म की पुनर्स्थापना का क्षण है। शब्द-ब्रह्म‍ की महिमा है। जगत् का कल्याण है। ज्ञान का निर्विकल्प प्रकाश है। सारे कर्मकांड तो उस ज्ञानज्योति तक जाने और उसके आलोक में स्वयं के स्वरूप को देखने-पाने के साधन मात्र हैं। अपने समय के बौद्धिकों को शंकराचार्य यही सूत्र समझाते हैं। अपने शिष्‍यों-साथियों के साथ बदरीकाश्रम में वैदिक धर्म की नई किंतु वास्तविक व्याख्या कर सनातन सत्य को सबके सामने रखते हैं। पुजारियों की सहमति से विष्णु के विग्रह को नारदकुंड से निकालकर वेद विधान से मंदिर में स्थापित करते हैं। अलकनंदा और केशव गंगा के पवित्र संगम पर स्थित व्यास गुफा में ब्रह्म‍सूत्र का भाष्य लिखकर भारतीय वाङ्मय का पुण्य अर्चन करते हैं।

आदि शंकराचार्य हिमालय के नर-नारायण पर्वतों के आशीष की धूप-छाँह में ज्ञानसाधना और योगसाधना दोनों साधते हैं। इसी दिव्य क्षेत्र से उन्हें अन्य ग्रंथों का भाष्य करने की अंतःप्रेरणा मिलती है। इसी देव भूमि से उन्हें कुमारिल भट्ट, मंडन मिश्र और उग्रभैरव से भेंट करने, संवाद करने, शास्त्रार्थ करने और वेदांत के अद्वैत दर्शन के मूल ज्ञानरूप से आत्मसात् करने का आत्मादेश भी प्राप्त होता है। बौद्ध धर्म में दीक्षित होने के बाद भी कुमारिल भट्ट का अखंड विश्‍वास है कि ‘वेद सत्य हैं।’ कुमारिल भट्ट अपने समय के भारतवर्ष के सुप्रसिद्ध वार्तिककार रहे हैं। शबरस्वामी के प्रसिद्ध मीमांसा भाष्य की उन्होंने टीकाएँ लिखी हैं। ये टीकाएँ ‘वार्तिक’ कही जाती हैं। उन्होंने ‘श्लोकवार्तिक’ और ‘तंत्रवार्तिक’ दो प्रसिद्ध टीकाएँ लिखी हैं। हिमालय से विदा लेकर शंकराचार्य तीर्थराज प्रयाग में कुमारिल भट्ट के दर्शनार्थ चल पड़ते हैं। तीर्थराज प्रयाग में कुमारिल भट्ट गुरु के अपमान करने के अपराध में तुषों (भूसा) के ढेर पर बैठे हैं। ढेर में अग्नि प्रविष्ट करा दी गई है। वे स्वयं को तुषों के साथ दाह कर गुरु अपमान के पाप से मुक्त होना चाहते हैं। शंकराचार्य उन्हें इस दशा में देखकर विह्व‍ल हो जाते हैं। उन्हें रोकते हैं। पर वे रुकते नहीं हैं। कुमारिल भट्ट जैसे परम योगी तपी को देखकर शंकराचार्य प्रणाम करते हैं। शंकराचार्य जैसे दिव्य संन्यासी के अपने महाप्रयाण की वेला में दर्शन कर कुमारिल भट्ट अमित तोष अनुभव करते हैं। माटी की देह भूसे के साथ अग्नि हो जाती है। हंसा उड़ जाता है।

माहिष्मती में परम शास्त्रज्ञ मंडन मिश्र अपनी परम विदुषी भार्या भारती के साथ वेदों के कर्मकांड के मत के प्रचार में संलग्न हैं। विषय के आधार पर वेदों के दो भाग हैं—ज्ञानकांड और कर्मकांड। शंकराचार्य आत्मानंद और विश्‍वशांति के लिए ज्ञानकांड को तप द्वारा उचित सिद्ध करनेवाले आदि आचार्य हैं। मंडन मिश्र के वैदूष्य का प्रभाव रहता है कि द्वार पर शुक-सारिका भी संस्कृत में संवाद करते हैं। मंडन मिश्र जितने गहरे गुणी-धर्मी हैं; उनकी धर्मनिष्ठ पत्नी उतनी कर्म-सिद्ध हैं। शंकराचार्य और मंडन मिश्र का शास्त्रार्थ प्रारंभ होता है। धर्मात्मा भारतीजी निर्णायक की भूमिका में हैं। शंकराचार्य अपना सिद्धांत प्रतिपादित करते हैं, ‘‘इस संपूर्ण ब्रह्म‍ांड में ब्रह्म‍ एक है। वह सत्, चित्, आनंद है। जब ब्रह्म‍ का ज्ञान होता है, तब जीव अपने वास्तविक विशुद्ध स्वरूप को प्राप्त होता है।’’ मंडन मिश्र अपना सिद्धांत रखते हैं, ‘‘वेद का सत्य रूप कर्म में है। वेद का कर्मकांड ही प्रमाण है। जीव की दुःखों से मुक्ति कर्म द्वारा ही होती है।’’ शास्त्रार्थ में मंडन मिश्र अपनी अर्द्धांगिनी सहित परास्त होते हैं। शंकराचार्य के शिष्य बन जाते हैं। शंकराचार्य उन्हें संन्यास पंथ में दीक्षित करते हैं। वे ही शंकराचार्य के शिष्य ‘सुरेश्‍वराचार्य’ कहलाते हैं।

माहिष्मती से शंकराचार्य दक्षिण की राह लेते हैं। मार्ग में वे अपने शिष्यों पद्मपाद और सुरेश्‍वराचार्य के साथ वैदिक धर्म का प्रचार करते चले जा रहे हैं। नाशिक में रामचंद्र और पंढरपुर में विट्ठल की पाद-पूजा कर वे कृष्णा और तुंगभद्रा के पवित्र संगम पर महिमावान श्रीशैल पर्वत पर पहुँचते हैं। यहाँ भगवान् मल्लिकार्जुन महादेव शिव विराजित हैं। यह शिव के बारह ज्योतिर्लिंगों में से एक है। यह तंत्रसाधना का केंद्र रहता है। यह प्राकृतिक रूप से अपूर्व सौंदर्यशाली है। श्रीशैल पर भव्य शिव मंदिर की शोभा निहारते मन नहीं भरता है। ज्योति स्वरूप शिव साक्षात् अनुभव में पैठते चले जाते हैं। पुण्य क्षेत्र पाशुपत, वैष्णव, शैव, शाक्त और कापालिकों की साधनाओं का केंद्र रहा है। शंकराचार्य देखते हैं कि यहाँ कापालिक उग्रभैरव की तंत्रसाधना दूर-दूर प्रभाव छोड़ रही है। कापालिक एक उग्रशैव संप्रदाय है। इसके साधक माला, अलंकरण, कुंडल, चूड़ामणि, भस्म, यज्ञोपवीत आदि छह प्रतीक धारण करते हैं। मनुष्यों की ह‌‍ड्डियों की माला पहनते हैं। श्मशान में रहते हैं। वहीं साधना करते हैं। शंकराचार्य को ऐसे अवैदिक पंथ से जनसामान्य को मुक्त कराना है। कापालिक उग्रभैरव को इस क्षेत्र में शंकराचार्य का आगमन रुचता नहीं है। पहले तो वह छल से शंकराचार्य का सेवक बनकर विश्‍वास प्राप्त करता है। बाद में रात्रि के समय उन पर प्राण घातक प्रहार कर मार डालना चाहता है। उसकी कुचाल सुरेश्‍वराचार्य भाँप जाते हैं। वे शंकराचार्य की रक्षा करते हैं। उग्रभैरव का नाश करते हैं। संपूर्ण सिद्ध क्षेत्र में वैदिक धर्म का प्रचार और स्थापना करते हैं। महाकवि कालिदास ऐसी विभूतियों के विषय में कहते हैं—पुण्यवंतों का मनोरथ कल्पवृक्ष के समान फल देनेवाला होता है—

सद्य एव सुकृतां हि पच्यते कल्पवृक्षफल—धर्मिकांक्षितम्।

शिष्य हस्तामलक और शिष्य तोटकाचार्य की प्राप्ति के बाद शंकराचार्य अपनी माँ के अंतिम दर्शन के लिए कालड़ी पहुँचते हैं। माँ जैसे बेटे शंकर की प्रतीक्षा ही कर रही हैं। शंकर के आते ही, उन्हें देखते ही वे अपनी अंतिम यात्रा पर चल देती हैं। उस यात्रा से उसी रूप में कौन कोई लौटकर नहीं आता है। शंकराचार्य संन्यासी होकर भी अपनी माँ का अंतिम संस्कार करते हैं। अपनी जन्मभूमि को अंतिम प्रणाम करके दिग्विजय के लिए शिष्यों के साथ चल पड़ते हैं। वे शृंगेरी मठ की स्थापना करते हैं। वे वैदिक धर्म का प्रचार करते हुए संपूर्ण भारतवर्ष को अद्वैत दर्शन से आप्लावित करते हैं। वे चारों तीर्थ धामों के निकट चार मठों की स्थापना करते हैं। जगन्नाथपुरी में गोवर्धनमठ, बदरकिआश्रम के पास ज्योतिर्मठ, द्वारकापुरी में शारदामठ, रामेश्‍वरधाम के पास मैसूर में शृंगेरीमठ स्थापित करते हैं। ज्योतिर्मठ में तोटकाचार्य, गोवर्धनमठ में पद्माचार्य, शृंगेरीमठ में सुरेश्‍वराचार्य और शारदामठ में हस्तामलकाचार्य को अध्यक्ष रूप में नियुक्त करते हैं। ये पद आज तक शंकराचार्य पीठ के नाम से सम्मानित हैं।

ऊँ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात् पूर्णमुदच्यते।

पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावषिष्यते॥

अदः और इदं दोनों में पूर्ण चिरपूर्ण है। पूर्ण ही नित्य स्वयं प्रकाश सत्ता के रूप में सर्वत्र पूर्ण रूप में विद्यमान है। पूर्ण अद्वय है। अनंत है। अखंड है। इस पूर्ण से जो उत्पन्न होता है, वह भी पूर्ण ही है। निःसृत स्वरूप पूर्ण में समाहित होकर पूर्ण ही रहता है। ज्ञानसाधना करते हुए वेदवाणी के आलोक में आदिशंकराचार्य अद्वैतवाद के रहस्य को भलीभाँति हृदयंगम करते है। ‘‘यह सृष्टि किसी बाहरी शक्ति से रचित नहीं है। यह उत्पत्ति, स्थिति और लय के क्रम में स्वमेव संचालित होती है। यह एक अनंत जीवन-क्रम है। यह ही ब्रह्म‍ है ‘तत्त्वमसि’। हे श्वेतकेतु! वह तू ही है। तू नर में है। तू नारी में है। तू युवा में है। तू बाल-वृद्ध में है। तू मुझमें है। मैं भी तू ही हूँ। तू चराचर में है। तू सबमें है।’’ इसी ब्रह्म‍ सत्य का प्रसार और स्थापना का कार्य पूर्ण कर आदि शंकराचार्य बत्तीस वर्ष की आयु में कैलाश धाम की ओर प्रस्थान कर जाते हैं। शंकर के स्वरूप शंकराचार्य कैलाश मानसरोवर से अपने शिवधाम की ओर महाप्रयाण कर जाते हैं। वैदिक धर्म अपनी सनातनता में गौरव पाता है। जनकल्याण का सहज पथ आलोकित होता है। आत्मा आनंदोत्सव मनाती है। मानसरोवर में कमल खिल जाते हैं। हंसा मोती चुगते हैं। सुमेरू के हिममंडित शुभ्र शिखर का रवि-रश्‍मियाँ अभिषेक करती हैं।

चिदानंदरूपः शिवोऽह शिवोऽहम्।

 

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श्रीराम परिहार

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